कश्मीर के इस गांव में फ़ोन चार्ज करने के लिए 45 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है

कश्मीर के इस गांव में फ़ोन चार्ज करने के लिए 45 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है

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इमेज कैप्शन, कुपवाड़ा ज़िले में हिमालय की पहाड़ियों के बीच बसे वन दजी गाँव में आज तक बिजली नहीं पहुंची है

19 वर्षीय कुलसोमा कुपवाड़ा ज़िले में हिमालय की पहाड़ियों के बीच बसे एक गांव में रहती हैं. यह गांव नियंत्रण रेखा (एलओसी) के क़रीब स्थित है.

उनके लिए आधुनिक ज़िंदगी एक दूर की चीज़ है. उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी आज भी पुराने दौर की याद दिलाती है.

वन दजी गांव की पांच पीढ़ियां आज तक बिजली की रोशनी नहीं देख पाई हैं. नई पीढ़ी भी चूल्हे के धुएँ और चिराग़ की रोशनी के बीच बड़ी हो रही है.

यह गांव वर्षों से बिजली का इंतज़ार कर रहा है. लेकिन अब तक इसे बिजली ग्रिड से नहीं जोड़ा गया है.

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‘हम पुराने दौर के आधुनिक इंसान हैं’

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इमेज कैप्शन, ज़िला कुपवाड़ा में खूबसूरत हिमालयी पहाड़ी श्रृंखला के बीच स्थित वन दजी गाँव

वन दजी तक पहुँचने वाले रास्ते मुश्किल हैं. यहाँ की ज़िंदगी भी कई परेशानियों से घिरी है. दिन भर मेहनत करने के बाद, जैसे ही शाम होती है, यहाँ के लोगों की एक नई जंग शुरू हो जाती है.

कुलसोमा कहती हैं, “यहाँ की महिलाओं की चिंता ज़्यादा है. दिन में चूल्हे का धुआँ होता है और रात में मशाल का धुआँ उन्हें बीमार कर देता है.”

वह कहती हैं कि जैसे ही वह गाँव से बाहर निकलती हैं, उन्हें महसूस होता है कि वह मानवीय सभ्यता का हिस्सा नहीं हैं.

“जब हम कुपवाड़ा बाज़ार जाते हैं, तो लोगों को स्मार्टफ़ोन में बिज़ी देखकर हीन भावना होती है. जब हम किसी रिश्तेदार के घर जाते हैं, तो वहाँ हीटर, बॉयलर, गीज़र जैसी सुविधाएँ देखते हैं.

तब लगता है कि हमारे लिए समय वहीं रुक गया है, जब लोग आग पर खाना बनाते थे और रात में आग की रोशनी में रहते थे. हम पुराने दौर के आधुनिक इंसान हैं.”

सड़क संपर्क की कमी और बिजली न होने के कारण लोग यहाँ पहाड़ों पर पैदल चलकर ही अपना दिन गुज़ारते हैं.

कुपवाड़ा ज़िला नियंत्रण रेखा (एलओसी) के क़रीब स्थित है. यह श्रीनगर से लगभग 75 किलोमीटर उत्तर में है. वन दजी गांव कुपवाड़ा शहर से करीब 45 किलोमीटर दूर पड़ता है.

गांव तक पहुंचने का रास्ता बेहद कठिन है. वाहन केवल 40 किलोमीटर तक ही जा सकते हैं. इसके बाद लोगों को पहाड़ चढ़कर गांव तक पहुंचना पड़ता है.

इसी रास्ते में हमारी मुलाकात बशीर अहमद मीर से हुई. उनके कंधे पर घर का सामान लदा हुआ था.

वह कहते हैं, “दिन में हम कुपवाड़ा से सामान ढोकर लाते हैं. रात में टॉर्च की रोशनी में ही एक-दूसरे का चेहरा देख पाते हैं.”

“यहां न सड़क है, न बिजली. सरकार को तो शायद यह भी नहीं पता कि वन दजी कहां है.”

यहां के लोग अपने मोबाइल फ़ोन और पावर बैंक चार्ज करने के लिए पहाड़ से उतरकर कुपवाड़ा जाते हैं. ऐसा इसलिए ताकि ज़रूरत पड़ने पर वे अपने रिश्तेदारों से संपर्क कर सकें.

हालांकि, यहां मोबाइल नेटवर्क भी बेहद कमज़ोर है.

‘मशाल के धुएँ ने दिल का मरीज़ बना दिया’

बिजली न होने का असर यहां के लोगों की सेहत पर भी साफ़ दिखाई देता है. अब्दुल रशीद मलिक पिछले दो वर्षों से इलाज करा रहे हैं. सीने में गंभीर संक्रमण के बाद उन्हें दिल की बीमारी हो गई.

वह कहते हैं, “हम हर हफ़्ते कई टन लकड़ी जलाते हैं. इससे सिर्फ़ घरों की दीवारें काली नहीं होतीं, हमारी सेहत भी प्रभावित होती है. पहले मुझे लगातार खांसी रहने लगी. फिर डॉक्टरों ने बताया कि मेरे सीने में संक्रमण है. बाद में पता चला कि धुएं की वजह से मुझे दिल की बीमारी हो गई.”

वह कहते हैं, “अगर यहां बिजली होती, तो शायद मेरी हालत ऐसी नहीं होती. मेरे परदादा, दादा और पिता ने कभी बिजली नहीं देखी. मेरी ज़िंदगी भी अंधेरे में गुज़री है. अब ये छोटे बच्चे हैं. इनके साथ क्या होगा, कोई नहीं जानता.”

करीब 500 से कम आबादी वाले इस गांव में अधिकांश लोग शाम होते ही मशालें जलाते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि इसकी वजह से सीने, गले और आंखों से जुड़ी बीमारियां आम हैं.

आख़िर कब पहुंचेगी बिजली

कुलसोमा
इमेज कैप्शन, यहाँ की महिलाओं को दिन में चूल्हे का धुआँ और रात में मशाल का धुआँ बीमार कर देता है.

बड़ा सवाल यही है कि अब तक इस गांव तक बिजली क्यों नहीं पहुंच पाई?

अधिकारियों का कहना है कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और दुर्गम रास्ते बिजली पहुंचाने में सबसे बड़ी बाधा हैं.

बिजली विभाग के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर मोहम्मद शफ़ी वानी ने बीबीसी से कहा, “वन दजी गांव समुद्र तल से करीब 12 हजार फीट की ऊंचाई पर है. यहां के रास्ते बेहद खतरनाक हैं. यहां बिजली पहुंचाई जा सकती है, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए सामान पहुंचाना बेहद मुश्किल काम है.”

हालांकि अधिकारियों के मुताबिक, अब इस गांव का इंतजार जल्द खत्म हो सकता है.

मोहम्मद शफ़ी वानी ने कहा, “हम कुछ सामान वहां पहुंचा चुके हैं. इस साल के अंत तक वन दजी को बिजली ग्रिड से जोड़ दिया जाएगा.”

शाम होते ही अंधेरा गहराने के बाद जब हम रियाज़ अहमद लोन के घर पहुंचे, तो उनकी 11 साल की बेटी आसिफ़ा आईटी यानी सूचना प्रौद्योगिकी का एक अध्याय पढ़ रही थी. उसी समय रियाज़ लकड़ी की मशाल जला रहे थे.

वह कहते हैं, “हमारे बच्चों का भविष्य दांव पर लगा है. आज जब लोग स्मार्टफोन के ज़रिये पूरी दुनिया से जुड़े हैं, हम अंधेरे में हैं. अगर बिजली नहीं है, तो फोन कैसे चार्ज होगा? हम अपने पावर बैंक को चार्ज करने के लिए कुपवाड़ा जाते हैं, ताकि इमरजेंसी में किसी को मदद के लिए फोन कर सकें.”

वन दजी गांव के मोहल्ला सदर (अध्यक्ष) मोहम्मद सुल्तान कई सालों से अधिकारियों के संपर्क में हैं, लेकिन अब तक बिजली की व्यवस्था नहीं हो पाई है.

वह कहते हैं, “मैं सालों से दफ्तरों के चक्कर लगाते-लगाते थक गया हूं. अब गांव में कुछ खंभे लगाए गए हैं, लेकिन न तार हैं और न ही कोई पूरी व्यवस्था. हमारी पांच पीढ़ियां अंधेरे में रहीं, लेकिन मुझे नई पीढ़ी की चिंता है.”

वह आगे कहते हैं, “उम्मीद है कि ये बच्चे जल्द ही बिजली की रोशनी देख पाएंगे.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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