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खरगोन जिले में मिर्च के गिरते दामों ने किसान की मेहनत पर पानी फेर दिया। टांडाबरूड के किसान प्रदीप कुमरावत ने बुधवार को अपनी दो एकड़ में खड़ी तैयार मिर्च की फसल पर रोटावेटर चला दिया। फसल तैयार करने में करीब एक लाख रुपए खर्च हुए थे। प्रदीप ने बताया कि पहली दो तुड़ाई में मिर्च का भाव 20 से 25 रुपए किलो मिला था। इसके बाद भाव लगातार गिरता गया। तीसरी तुड़ाई तक सिर्फ मजदूरी 6 रुपए किलो हो गई थी। इसके अलावा वाहन भाड़ा और पैकिंग का खर्च भी था। बाद में मिर्च का भाव घटकर 8 रुपए किलो रह गया। इस भाव में तुड़ाई, मजदूरी, पैकिंग और परिवहन का खर्च निकालना भी मुश्किल हो गया। इसलिए ट्रैक्टर चला दिया। जिले में मंडी नहीं, बड़े शहरों में भेजनी पड़ती है फसल दरअसल, किसानों के पास मिर्च बेचने के लिए स्थानीय मंडी की सुविधा नहीं है। उन्हें कमीशन एजेंटों के जरिए उपज इंदौर और दूसरे बड़े शहरों की मंडियों में भेजनी पड़ती है। प्रदीप के अनुसार, हरी मिर्च को ज्यादा समय तक रखा भी नहीं जा सकता। करीब 48 घंटे में यह खराब होने लगती है। इसलिए कम भाव मिलने पर भी किसान को फसल बेचनी पड़ती है। अच्छी फसल हुई, लेकिन भाव नहीं मिला प्रदीप ने बताया कि इस साल मिर्च की पैदावार अच्छी रही। लेकिन बाहर के बाजारों में मांग कम होने से भाव गिरते गए। दो एकड़ फसल पर करीब एक लाख रुपए खर्च करने के बाद भी उचित कीमत नहीं मिली। आगे फसल की तुड़ाई और उसे मंडी तक भेजने में भी खर्च होना था। ऐसे में किसान के लिए आगे फसल निकालना घाटे का सौदा बन गया। आखिरकार प्रदीप ने बुधवार को खेत में खड़ी अपनी पूरी मिर्च की फसल पर रोटावेटर चला दिया। जिस फसल को तैयार करने में महीनों की मेहनत और एक लाख रुपए खर्च हुए, वह कुछ ही देर में खेत में मिल गई।
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