पिता ने बेटे के लिए बदल दी जिंदगी
धीरज के पिता श्रवण कुमार खेलों के बड़े प्रशंसक थे। उन्होंने बेटे को बैडमिंटन, फुटबॉल, टेनिस और क्रिकेट से परिचित कराया, लेकिन धीरज का मन कहीं नहीं लगा। एक दिन उनकी नजर तीरंदाजी का अभ्यास कर रहे खिलाड़ियों पर पड़ी और यहीं से सफर शुरू हुआ। धीरज की मदद करने के लिए श्रवण कुमार ने खुद तीरंदाजी को समझना शुरू किया। बाद में उन्होंने तीरंदाजी संघ की जज परीक्षा पास की और आंध्र प्रदेश के वरिष्ठ तीरंदाजी जजों में शामिल हो गए। श्रवण कुमार ने कहा, ‘मैंने खुद तीरंदाजी सीखी ताकि हर कदम पर बेटे का मार्गदर्शन कर सकूं। यह सिर्फ उसका नहीं, हमारा साझा सफर था।’
जब मां ने गिरवी रखा मंगलसूत्र
धीरज के करियर का सबसे मुश्किल दौर 2017 में आया। बेहतर प्रशिक्षण के लिए उन्हें महंगे विदेशी उपकरणों की जरूरत थी, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति इसकी इजाजत नहीं देती थी। हालात ऐसे हो गए कि धीरज तीरंदाजी छोड़ने तक का मन बना चुके थे। तभी उनकी मां रेवती ने बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपना मंगलसूत्र गिरवी रखकर कर्ज लिया ताकि बेटे के लिए नया धनुष खरीदा जा सके। धीरज आज भी उस पल को याद करते हैं। उन्होंने कहा, ‘एक समय ऐसा था जब मैं तीरंदाजी छोड़ने वाला था। मेरी मां ने अपना मंगलसूत्र गिरवी रख दिया ताकि मैं धनुष खरीद सकूं। मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह बहुत बड़ी बात होती है।’
पेरिस की निराशा से अंताल्या की जीत तक
दो साल पहले पेरिस ओलंपिक में धीरज पदक के बेहद करीब पहुंचकर चूक गए थे। वह भारत को तीरंदाजी में पहला ओलंपिक पदक दिलाने से बस एक कदम दूर रह गए थे। उस हार ने उन्हें तोड़ा जरूर, लेकिन रोका नहीं। अंताल्या में उन्होंने उसी दक्षिण कोरिया के तीरंदाजों को हराकर दो स्वर्ण पदक जीते, जिनके खिलाफ भारतीय तीरंदाजी टीम अक्सर दबाव महसूस करती थी।
राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने दी बधाई
आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एस. अब्दुल नजीर और मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने धीरज को इस उपलब्धि पर बधाई दी। नायडू ने कहा कि दक्षिण कोरिया के मजबूत प्रतिद्वंद्वियों को हराकर स्वर्ण जीतना धीरज की असाधारण प्रतिभा का प्रमाण है।
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