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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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प्रकाशित
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बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में 400 पार का नारा दिया था लेकिन उसे पूर्ण बहुमत भी नहीं मिला था.
बीजेपी 240 सीटों पर ही सिमटकर रह गई थी लेकिन सरकार बनाने के लिए 272 सीटें की ज़रूरत होती है. यानी बीजेपी को साधारण बहुमत से 32 सीटें कम मिली थीं.
ऐसे में मोदी सरकार एनडीए के सहयोगी दलों के समर्थन से चल रही है.
लोकसभा में सीटों के लिहाज से आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देसम पार्टी (टीडीपी) 16 सीटों के साथ एनडीए में सबसे बड़ा सहयोगी दल था. वहीं नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड लोकसभा सीटों के लिहाज से एनडीए की दूसरी बड़ी पार्टी थी. जेडीयू के 12 सांसद हैं.
लेकिन तृणमूल कांग्रेस के 20 बाग़ी सांसदों ने एक अनजान सी नेशनल सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया में ख़ुद को शामिल कर लिया और एनडीए को समर्थन देने की घोषणा कर दी. यानी लोकसभा में अब एनडीए की सबसे बड़ी सहयोगी ये अनजान सी पार्टी हो गई है.
इसी तरह एकनाथ शिंदे की शिव सेना को 2024 के लोकसभा चुनाव में सात सीटों पर जीत मिली थी लेकिन इसी महीने उद्धव ठाकरे की शिव सेना के छह सांसदों ने पाला बदल लिया और शिंदे गुट में आ गए.
बदल रहा है समीकरण
यानी एकनाथ शिंदे की शिव सेना के पास अब कुल 13 सांसद हो गए हैं. यानी लोकसभा में जेडीयू से भी बड़ी पार्टी शिव सेना हो गई है. एकनाथ शिंदे की शिव सेना पहले से ही एनडीए के साथ है.
चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के भी पाँच लोकसभा सांसद हैं. इसके अलावा भी कुछ छोटी-छोटी पार्टियां हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को 293 सीटों पर जीत मिली थी लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 319 हो गई है.
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बीजेपी अब उन आंकड़ों के क़रीब पहुंच रही है, जो अहम संवैधानिक संशोधनों को पारित कराने के लिए अनिवार्य हैं.
आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद भी टूटकर अलग हुए और सीधे बीजेपी में शामिल हो गए हैं.
दूसरी तरफ़ द्रविड़ मुनेत्र कषगम यानी डीएमके के लोकसभा में 22 सांसद हैं और इसने इंडिया गठबंधन से दूरी बना ली है. वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं कि डीएमके भी बीजेपी सरकार को मुद्दों के आधार पर समर्थन दे सकती है.
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लोकसभा का गणित
अभी लोकसभा में कुल 540 सांसद हैं. ऐसे में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 360 पर पहुँचता है. बीजेपी अब भी दो तिहाई बहुमत से दूर है.
लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत का आँकड़ा 362 है, क्योंकि सदन की कुल संख्या 543 है.
फ़िलहाल तीन लोकसभा सीटें ख़ाली हैं. असम की नागांव, पश्चिम बंगाल की बसीरहाट और मेघालय की शिलॉन्ग. एनडीए को उम्मीद है कि वह तीनों सीटें जीत सकता है.
अगर एनडीए तीनों उपचुनाव जीत लेता है तो परिसीमन विधेयक पर सरकार को 323 वोट तक मिलने की उम्मीद हो सकती है.
इसके बावजूद, वह दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े से अब भी कम-से-कम 20 सीट दूर रहेगी.
विश्लेषक कहते हैं कि डीएमके के 22 सांसदों का समर्थन भले ना मिले लेकिन कम-से-कम मतदान से दूर रहने के लिए मनाया जा सकता है.
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राज्यसभा में नया समीकरण
हाल के महीनों में एनडीए राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े 164 के क़रीब पहुंच गया है. राज्यसभा की कुल सदस्य संख्या 245 है.
बीजू जनता दल छोड़ने के बाद 12 जून को देबाशीष सामंतराय बीजेपी के टिकट पर निर्विरोध निर्वाचित हुए. इससे बीजेपी की राज्यसभा में संख्या बढ़कर 115 हो गई.
इसके अलावा, एनडीए को अब उच्च सदन में कम-से-कम 149 सांसदों का समर्थन हासिल है.
27 सीटों के लिए चल रहे राज्यसभा चुनाव 28 जून को समाप्त होने के बाद एनडीए की संख्या में तीन और सीटों की बढ़ोतरी होने की संभावना है.
इसके बाद, जब भी उन ख़ाली सीटों पर चुनाव होंगे जो टीएमसी के तीन सांसदों सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक के इस्तीफे के कारण खाली हुई हैं तब एनडीए अपने खाते में तीन और सीटें जोड़ सकता है.
टीएमसी के पास अब राज्यसभा में केवल 10 सांसद बचे हैं.
इसके अलावा कुछ छोटे दल भी हैं जो न एनडीए के साथ हैं और न ही इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं.
इनमें वाईएसआर कांग्रेस (7 सांसद), बीजू जनता दल (5 सांसद), आम आदमी पार्टी और भारत राष्ट्र समिति (3-3 सांसद) के अलावा बीएसपी (1 सांसद) शामिल हैं.
परिसीमन विधेयक पर मतदान के दौरान डीएमके के आठ सांसदों के मतदान से दूर रहने की भी संभावना जताई जा रही है.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं कि बीजेपी का पूरा ज़ोर है कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले परिसीमन बिल पास करवा लिया जाए.
नीरजा चौधरी कहती हैं, ”बीजेपी को पता है कि परिसीमन का सीधा फ़ायदा उसे होगा और महिला आरक्षण पास कराने का श्रेय भी ले लेगी. जिस तरह से क्षेत्रीय पार्टियों में टूट जारी है, वैसे में दो तिहाई का बहुमत हासिल करना बहुत मुश्किल नहीं रह जाएगा. चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश से बाहर का सोचते नहीं हैं. उन्हें बस केंद्र से फंड मिलता रहे. बीजेपी को केंद्र में सरकार चलाने के लिए अब टीडीपी पर उस तरह से निर्भरता नहीं रही.”
नीरजा चौधरी कहती हैं कि क्षेत्रीय पार्टियों को कमज़ोर होने से कांग्रेस को फ़ायदा मिल सकता है लेकिन उसकी सांगठनिक कमज़ोरी आड़े आएगी.
जो क्षेत्रीय पार्टियां टूट रही हैं, उनके सांसदों को बीजेपी ख़ुद में शामिल क्यों नहीं कर रही है? इस सवाल के जवाब में नीरजा चौधरी कहती हैं, बीजेपी नहीं चाहती है कि विपक्ष का पूरा स्पेस कांग्रेस को मिले. नीरजा कहती हैं कि बीजेपी सत्ता और विपक्ष दोनों में रहना चाहती है.
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कांग्रेस क्या करेगी?
मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने बुधवार को आरोप लगाया कि बीजेपी लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की कोशिश कर रही है, क्योंकि उसका वास्तविक और अंतिम लक्ष्य संविधान में संशोधन कर आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करना है.
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने समाचार एजेंसी पीटीआई के दिए इंटरव्यू में दावा किया कि सत्तारूढ़ पार्टी पहले महिला आरक्षण के नाम पर परिसीमन को आगे बढ़ाना चाहती है, जबकि उसका अंतिम मक़सद आरक्षण को पूरी तरह ख़त्म करना है.
उन्होंने कहा कि परिसीमन पहला बड़ा पड़ाव है, जिसे बीजेपी पार करना चाहती है, लेकिन इस सरकार के कार्यकाल में अभी तीन साल बाक़ी हैं और उसका दीर्घकालिक लक्ष्य कहीं बड़ा है.
17 अप्रैल को 2029 से विधानसभाओं और संसद में महिला आरक्षण लागू करने के साथ लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक निचले सदन में पारित नहीं हो सका था.
विधेयक के समर्थन में 298 सांसदों ने वोट किया था जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया था.
कुल 528 सांसदों ने मतदान में हिस्सा लिया. तब दो-तिहाई बहुमत के लिए इस विधेयक को 352 वोटों की ज़रूरत थी.
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परिसीमन बिल अहम क्यों?
बीजेपी के लिए परिसीमन विधेयक को काफ़ी अहम माना जा रहा है.
परिसीमन से लोकसभा में अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों का प्रतिनिधित्व दक्षिणी, पश्चिमी और छोटे राज्यों की तुलना में काफ़ी बढ़ जाएगा. उत्तर भारत में बीजेपी पहले से ही बहुत मज़बूत स्थिति में है.
सरकार की परिसीमन को आगे बढ़ाने की पहली कोशिश केवल दो महीने पहले विफल हुई थी. सरकार ने इसे महिला आरक्षण जैसे व्यापक रूप से लोकप्रिय मुद्दे से जोड़ा था.
विपक्षी दल इस विधेयक के ख़िलाफ़ एकजुट हो गए. उनका तर्क था कि इससे अधिक जनसंख्या वाले हिन्दी भाषी राज्यों को असमान रूप से लाभ मिलेगा, जहाँ बीजेपी को मज़बूत समर्थन हासिल है जबकि उन राज्यों को नुक़सान होगा, जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में सफलता हासिल की है.
1976 से लोकसभा सीटें व्यावहारिक रूप से 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर बनी हुई हैं. अगर इस रोक को हटाया जाता है तो चीज़ें जटिल हो सकती हैं. उत्तरी राज्य अपनी बढ़ती आबादी के अनुरूप अधिक सीटों की मांग करेंगे, जो एक व्यक्ति, एक वोट के लोकतांत्रिक सिद्धांत के अनुरूप है.
वहीं दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों का राजनीतिक प्रभाव घट सकता है, जबकि वे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में असमान रूप से अधिक योगदान देते हैं और जनसंख्या नियंत्रण के संघीय लक्ष्यों को हासिल करने में सफल रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि छोटे पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों के और अधिक हाशिये पर जाने की आशंका भी है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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