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तेल की क़ीमतें ईरान जंग शुरू होने से पहले के स्तर पर लौट आई हैं और माना जा रहा है कि इससे दुनिया के तीसरे सबसे बड़े कच्चे तेल आयातक भारत को बड़ी आर्थिक राहत मिल सकती है.
गुरुवार को वैश्विक मानक ब्रेंट क्रूड कुछ समय के लिए 72.48 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया. यह वही स्तर था, जो 28 फ़रवरी को अमेरिका और इसराइल के ईरान पर हमले शुरू करने से एक दिन पहले था. शुक्रवार को तेल की क़ीमतें और घटकर 72.60 डॉलर प्रति बैरल हो गईं.
बीते क़रीब चार महीनों में ईरान की जवाबी कार्रवाई से ऊर्जा क़ीमतों में तेज़ उतार-चढ़ाव देखा गया. ईरान ने प्रभावी रूप से होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद कर दिया था, जोकि तेल और गैस की आपूर्ति के लिए दुनिया का एक बेहद अहम समुद्री मार्ग है.
17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच एक एमओयू पर हस्ताक्षर होने के बाद से कच्चे तेल की क़ीमतों में लगातार गिरावट देखी जा रही है और बाज़ार के जानकारों का कहना है कि आने वाले समय में तेल के दामों और गिरावट आ सकती है. हालांकि अभी बाज़ार हालात पर नज़र बनाए रखेगा.
ग़ौरतलब है कि ईरान जंग के दौरान तेल की क़ीमतों में 120 डॉलर प्रति बैरल तक उछाल आ गया था.
लेकिन कच्चे तेल की क़ीमतों में तेज़ गिरावट के बावजूद भारत में खुदरा ईंधन दरों में कोई बदलाव नहीं हुआ है.
जबकि हाल में अंतरराष्ट्रीय तेल क़ीमतों में उछाल के दौरान पेट्रोल और डीज़ल के दामों में लगभग 7.50 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी. दामों को स्थिर करने के लिए केंद्र सरकार ने पेट्रोल डीज़ल पर एक्साइज़ ड्यूटी को भी कम किया था.
इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने बताया कि सरकारी क्षेत्र की तीनों कंपनियां इस समय पेट्रोल की बिक्री पर अच्छा मार्केटिंग मार्जिन कमा रही हैं, जबकि डीज़ल की बिक्री पर अभी भी मामूली घाटा हो रहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक़, “उद्योग से जुड़े अधिकारियों ने कहा कि कच्चे तेल की हालिया गिरावट का फ़ायदा उपभोक्ताओं तक पहुंचने में कुछ समय लग सकता है.”
बीबीसी न्यूज़ हिंदी से बात करते हुए बाज़ार विश्लेषकों ने कहा कि किसी भी राहत के लिए भारतीय उपभोक्ताओं को दो से ढाई महीने तक इंतज़ार करना पड़ सकता है और वो भी तब जब ऊर्जा बाज़ार इसी तरह अधिक से अधिक स्थिर होता जाए.
सरकार ने बंद की अंतर मंत्रालयी ब्रीफ़िंग?

पश्चिम एशिया में व्यापक सैन्य संघर्ष के बाद जब ईंधन संकट पैदा हुआ तो भारत सरकार ने हालात पर नज़र रखने के लिए एक अंतरमंत्रालयी कमेटी बनाई थी जिसकी ब्रीफ़िंग रोज़ाना के स्तर पर की जाती थी.
मनी कंट्रोल वेबसाइट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, “तेल बाज़ार में हालिया तनाव कम होने का असर सरकार की प्रतिक्रिया में भी दिखा है. संघर्ष शुरू होने के बाद शुरू की गई अंतर-मंत्रालयी ब्रीफ़िंग को फ़िलहाल चुपचाप रोक दिया गया है, जो यह संकेत देता है कि ऊर्जा आपूर्ति में तत्काल व्यवधान को लेकर चिंता कम हुई है.”
रिपोर्ट के अनुसार, “शुरुआत में ये ब्रीफ़िंग रोज़ होती थीं, बाद में इन्हें घटाकर हफ़्ते में दो बार कर दिया गया था. इन बैठकों में अहम मंत्रालयों के अधिकारी शामिल होते थे और सरकार की तैयारियों और क्राइसिस मैनेजमेंट की जानकारी दी जाती थी.”
“पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधिकारी नियमित रूप से इन बैठकों में मौजूद रहते थे और ईंधन आपूर्ति को सुरक्षित रखने तथा बाज़ार में स्थिरता बनाए रखने के लिए उठाए गए क़दमों की जानकारी देते थे. इस हफ़्ते तय कार्यक्रम के मुताबिक़ सोमवार और गुरुवार को कोई ब्रीफ़िंग नहीं हुई.”
भारत के लिए राहत
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इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक़, भारत जो कच्चा तेल ख़रीदता है, उसका औसत दाम बीते 27 फ़रवरी को 71.17 डॉलर प्रति बैरल था.
इसके दूसरे दिन यानी 28 फ़रवरी को अमेरिका और इसराइल ने ईरान पर हमला कर दिया था.
पीपीएसी के अनुसार, पूरे जून महीने में भारतीय बास्केट का औसत दाम 86.31 डॉलर प्रति बैरल रहा, जबकि फ़रवरी 2026 में यह औसत 72.47 डॉलर प्रति बैरल था.
हालांकि ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के निदेशक अजय श्रीवास्तव ने इस बास्केट प्राइस को भी अधिक बताया.
बीबीसी हिन्दी न्यूज़ से बात करते हुए उन्होंने कहा, “भारत कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक देश है और उसे अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की तुलना में कम क़ीमत में तेल मिलना चाहिए. ये बॉस्केट प्राइस भी अधिक है. भारत सरकार को इस बारे में कोई रणनीति बनानी चाहिए.”
भारत की ओर से आयात किए जाने वाले कच्चे तेल की औसत अंतरराष्ट्रीय क़ीमत को भारतीय बास्केट कहा जाता है.
ईरान और अमेरिका के बीच एमओयू के बाद अमेरिका ने ईरान के तेल से 60 दिन के लिए प्रतिबंध हटा लिया है. कुछ विश्लेषकों का कहना है कि अब ईरानी तेल के भी भारतीय बास्केट में शामिल होने की संभावना बढ़ गई है.
ऐसी स्थिति में ईंधन कंपनियों और सरकार पर उपभोक्ताओं को राहत देने का दबाव बढ़ सकता है, ख़ासतौर पर तब जब कच्चे तेल की क़ीमतें लंबे समय तक नीचे बनी रहती हैं.
ईंधन के कम दाम महंगाई के दबाव को और कम कर सकते हैं और दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत के ऑयल बिल को कम कर सकते हैं, और चालू खाते का घाटा भी कम हो सकता है.
लेकिन होर्मुज़ स्ट्रेट खुलने से अंतरराष्ट्रीय क़ीमतों में भी गिरावट हुई है. अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि बीते 24 घंटों में होर्मुज़ स्ट्रेट से क़रीब दो करोड़ बैरल तेल गुजरा है. ऐसे में स्थिति और सुधरने की उम्मीद की जा रही है.
समुद्री आवागमन को ट्रैक करने वाली वेबसाइट केप्लर के अनुसार, 25 जून को भी होर्मुज़ स्ट्रेट से कमर्शियल और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े कुल 54 सत्यापित आवाजाही दर्ज की गई.
कई जहाज़ों की आवाजाही ‘डार्क’ या ‘अज्ञात’ श्रेणी में दर्ज की गई. वहीं, ओमान के दहित के दक्षिण-पूर्व में एक मालवाहक जहाज़ पर कथित प्रोजेक्टाइल हमले की घटना ने जोखिम को फिर बढ़ा दिया है.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

एक्सपर्ट्स का मानना है कि कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय क़ीमतों में कमी का भारतीय उपभोक्ताओं को तुरंत लाभ नहीं मिलेगा, हालांकि इससे ऊर्जा सब्सिडी का बोझ भी कम हो सकता है और सरकार की वित्तीय स्थिति बेहतर हो सकती है.
अंतरराष्ट्रीय तेल बाज़ार के विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा ने बीबीसी हिन्दी न्यूज़ से बात करते हुए कहा कि सितंबर से पहले घरेलू उपभोक्ताओं के लिए ईंधन के दाम कम होने की संभावना नहीं है.
उन्होंने कहा, “आज जो दाम हैं उस आधार पर ख़रीदे गए ईंधन को भारत पहुंचने में हफ़्ते भर से दो महीने तक का समय लग सकता है. क्योंकि अभी वो तेल आ रहा है जिसे महंगे दामों पर ख़रीदा गया था. अभी भारत 40 अलग अलग देशों से तेल आयात करता है. अमेरिका, मेक्सिको, ब्राज़ील से तेल भारत आने में क़रीब दो महीने और रूस से एक महीना लग जाता है.”
दरअसल भारत अपनी कुल ज़रूरत का 88 फ़ीसदी से ज़्यादा कच्चा तेल आयात करता है. पीआईबी के अनुसार, पहले भारत के तेल आयात का आधा हिस्सा स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से होकर गुजरता था, अब यह घटकर 30 प्रतिशत हो गया है, जिससे जोख़िम कम हुआ है.
नरेंद्र तनेजा का कहना है कि विदेशों से आयात होने से लेकर भारतीय उपभोक्ताओं तक पहुंचने का एक चक्र क़रीब ढाई महीने का होता है. पहले सऊदी अरब जैसे देशों से तेल आता था तो यह चक्र छोटा होता था.
वो कहते हैं, “आज जो तेल पेट्रोल पंपों पर मिल रहा है उसे भारतीय कंपनियों ने ढाई महीने पहले 110 से 130 डॉलर प्रति बैरल की दर से ख़रीदा था.”
उनके अनुसार, “मेरे हिसाब से सितम्बर तक सस्ता तेल आएगा, तब तक कंपनियां अपना कुछ घाटा भी पूरा कर चुकी होंगी और उस समय तीज त्योहार का मौसम भी शुरू हो चुका होगा. तब सरकार ईंधन के दामों में कुछ राहत दे सकती है.”
लेकिन वो ये भी चेतावनी देते हैं कि ये आकलन इस धारणा पर आधारित है कि ईरान और अमेरिका के बीच सबकुछ ठीक चलेगा. हालांकि अभी बातचीत जारी है और इस बीच कभी कभी दामों में उछाल भी देखने को मिल सकता है.
कई विश्लेषकों की तरह नरेंद्र तनेजा का भी मानना है कि स्थिति सामान्य होगी क्योंकि अमेरिका अब ईरान जंग से बाहर निकलना चाहता है. नरेंद्र तनेजा इसका सबसे बड़ा कारण ‘अमेरिका में घरेलू स्तर पर तेल के दामों में 70 फ़ीसदी तक बढ़ोत्तरी’ को मानते हैं.
वो कहते हैं, “इस जंग से अमेरिका की अर्थव्यवस्था काफ़ी प्रभावित हुई है और जंग से बाहर निकलने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाज़ार में स्थिरता बनी रहेगी.”
‘भारत में पारदर्शिता की कमी’
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कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दामों में कमी का लाभ भारतीय उपभोक्ताओं को दिए जाने को लेकर सोशल मीडिया पर भी बहस शुरू हो गई है.
रेडिट पर एक यूज़र ने सवाल किया, “बीते तीन महीने में कच्चे तेल की भविष्य की ख़रीदारी (फ़्यूचर बाईंग) में क़रीब 15% की गिरावट आई है लेकिन उस अनुपात में भारत में ईंधन के दाम कम होते नहीं दिखे.”
“इस बीच कुछ देशों ने ईंधन के दामों में कटौती की घोषणा की है…लेकिन ऐसा क्यों है कि जब तेल के दाम बढ़ते हैं तो घरेलू दाम भी तेज़ी से बढ़ जाते हैं, लेकिन जब तेल के दाम गिरते हैं तो उसका फ़ायदा उपभोक्ताओं को नहीं मिलता?”
जीटीआरआई के निदेशक अजय श्रीवास्तव भारत सरकार के विदेश व्यापार महानिदेशालय में ‘एडिशनल डायरेक्टर जनरल फ़ॉरेन ट्रेड’ के पद पर रह चुके हैं.
बीबीसी हिन्दी न्यूज़ से बात करते हुए उन्होंने कहा, “कच्चे तेल के दाम और पंप पर मिलने वाले तेल के दाम में कोई संबंध नहीं है. कई बार ऐसा भी हुआ है कि जब क्रूड के दाम 30 डॉलर प्रति बैरल थे तब घरेलू स्तर पर 90-100 रुपये प्रति लीटर तक चार्ज किए गए. सरकार के पास कहने को यह भी हो सकता है कि दाम स्थिर होने तक हालात पर नज़र बनाए रखी जाए.”
“जब क्रूड के दाम कम होते हैं तो सरकार टैक्स बढ़ा देती है. आज ज़रूरत है कि सरकार एक पारदर्शी सिस्टम ले आए और बताए कि बास्केट प्राइस के मुक़बले जो पंप पर तेल मिलता है उसमें रिफ़ाइनिंग और वितरण कंपनियों को कितना प्रतिशत मिलता है और राज्य-केंद्र सरकारों के टैक्स का कितना प्रतिशत है.”
अजय श्रीवास्तव ने बताया, “साल 2010 में मनमोहन सिंह की सरकार ने एडमिनिस्ट्रेशन प्राइस मैकेनिज़्म को ख़त्म करके तेल की क़ीमतों को डीरेगुलेट किया था और यह सिस्टम 2016-17 तक चला लेकिन उसके बाद सरकारों ने टैक्स बढ़ा कर तेल की क़ीमतों को नियंत्रित किया.”
मौजूदा हालात में तेल की क़ीमतों को कम करने को लेकर वो कहते हैं, “कुछ कहा नहीं जा सकता कि दाम कम होंगे या नहीं. सबकुछ सरकार के हाथ में है. और उसमें कोई ट्रांसपेरेंसी नहीं है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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