Chidambaram Opposes One Nation One Election

Chidambaram Opposes One Nation One Election

नई दिल्ली14 मिनट पहले

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Chidambaram Opposes One Nation One Election

पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने सोमवार को लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव का विरोध किया। उन्होंने संसद की संयुक्त समिति के सामने इसे “राक्षसी” और “असंवैधानिक” पहल बताया।

पूर्व गृह और वित्त मंत्री ने कहा कि “एक देश, एक चुनाव” के तहत पूरे देश में चुनाव कराने का प्रस्ताव “बिना सोचे-समझे” किया गया काम है।

सूत्रों के मुताबिक, चिदंबरम ने यह राय संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 पर समिति के सामने रखी।

चिदंबरम ने विधेयकों को असंवैधानिक बताया

सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस नेता ने कहा कि एक साथ चुनाव कराने से जुड़े दोनों विधेयक असंवैधानिक हैं। उनका तर्क था कि हर विधानसभा और संसद का कार्यकाल पांच साल के लिए होता है, इसलिए उसका कार्यकाल घटाना संविधान के मूल ढांचे का सीधा उल्लंघन है।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि उनका जमीर उन्हें इन विधेयकों का समर्थन करने की इजाजत नहीं देता। सूत्रों के अनुसार, उन्होंने यह भी कहा कि सरकार के पास कानून पास कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं है।

तृणमूल कांग्रेस की समिति सदस्य सागरिका घोष ने भी विधेयक का विरोध किया। उन्होंने कहा कि इससे चुनाव आयोग को “बेलगाम” अधिकार मिल जाएंगे।

पद्म पुरस्कार पाने वालों की राय बंटी

भाजपा सदस्य पीपी चौधरी की अध्यक्षता वाली समिति के सामने करीब 10 पद्म पुरस्कार पाने वाले लोग भी अलग से पेश हुए। इनमें तरलोचन सिंह, नवीन खन्ना, मीनाक्षी जैन और नीरू कुमार शामिल थे।

इनमें से कुछ पद्म पुरस्कार पाने वालों ने एक साथ चुनाव कराने की पहल का समर्थन किया। वहीं, कुछ ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इससे देश में “अराजकता” फैल सकती है।

दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश हुए थे विधेयक

दोनों विधेयक दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए गए थे। इसके बाद जांच के लिए इन्हें संसद की संयुक्त समिति के पास भेजा गया।

इन विधेयकों को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की सिफारिश के बाद तैयार किया गया था। समिति ने लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव चरणबद्ध तरीके से एक साथ कराने की सिफारिश की थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी कोविंद की अध्यक्षता वाली इस उच्चस्तरीय समिति के सदस्य थे।

1951 से 1967 तक चुनाव एक साथ हुए

संविधान लागू होने के बाद 1951 से 1967 तक लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए गए थे। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के पहले आम चुनाव 1951-52 में एक साथ हुए थे।

इसके बाद 1957, 1962 और 1967 के तीन लगातार आम चुनाव भी इसी व्यवस्था के तहत कराए गए। हालांकि, 1968 और 1969 में कुछ राज्य विधानसभाएं समय से पहले भंग हो गईं, जिसके चलते एक साथ चुनाव कराने का चक्र टूट गया।

चौथी लोकसभा भी 1970 में समय से पहले भंग कर दी गई थी। इसके बाद 1971 में नए चुनाव कराए गए। पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा ने अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था, लेकिन आपातकाल लागू होने के कारण पांचवीं लोकसभा का कार्यकाल अनुच्छेद 352 के तहत 1977 तक बढ़ा दिया गया था।

इसके बाद केवल कुछ लोकसभाएं ही पूरे पांच साल चलीं। इनमें आठवीं, दसवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं लोकसभा शामिल हैं। छठी, सातवीं, नौवीं, 11वीं, 12वीं और 13वीं लोकसभा को समय से पहले भंग कर दिया गया था।

राज्य विधानसभाओं को भी पिछले वर्षों में इसी तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा। समय से पहले विधानसभा भंग होने और कार्यकाल बढ़ने की घटनाएं बार-बार सामने आती रही हैं।

इन घटनाओं से एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था पूरी तरह टूट गई और देश में चुनावों का मौजूदा चरणबद्ध कार्यक्रम बन गया।

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