नेशनल एजुकेटेड यूथ यूनियन (NEYU) ने छात्र आंदोलन को लेकर न्याय यात्रा का आह्वान किया था। यह यात्रा 23 जुलाई की दोपहर को निकलने वाली थी, लेकिन इसके शुरू होने से पहले ही पुलिस ने छात्र नेता राधे जाट और सुरेंद्र यादव को हिरासत में ले लिया। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई आगे बढ़ाते हुए विजय चौधरी, चंद्रशेखर गुर्जर, गौरव परिहार और रमन गोस्वामी को भी अपनी हिरासत में ले लिया। पुलिस द्वारा इन सभी छात्र नेताओं को एसीपी कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया। पुलिस की इस कार्रवाई के खिलाफ छात्र नेताओं की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई।
एसीपी कोर्ट की कठिन जमानत शर्त से परेशानी बढ़ी
छात्र नेताओं की ओर से अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल और अधिवक्ता जयेश गुरनानी के माध्यम से हाई कोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका लगाई गई। इस याचिका पर सुनवाई के दौरान पुलिस ने यह स्वीकार किया कि उन्होंने छात्र नेताओं को गिरफ्तार कर एसीपी कोर्ट में पेश किया था, जहां से उन्हें जेल भेजा गया है। इसका मुख्य कारण यह था कि एसीपी कोर्ट ने जमानत के लिए एक लाख रुपये के बाउंडओवर के साथ ही किसी सरकारी कर्मचारी की जमानत गारंटी पेश करने की शर्त रखी थी, जिसे छात्र नेता पूरा नहीं कर सके।
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हाई कोर्ट ने रद्द की कठोर शर्त
हाई कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान अधिवक्ता जयेश गुरनानी ने एसीपी कोर्ट की इस शर्त पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि बेरोजगार युवा इतनी बड़ी राशि की जमानत कैसे दे सकते हैं और उनके लिए किसी सरकारी अधिकारी की गारंटी लाना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
अदालत का रिहाई का आदेश
हाई कोर्ट के जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की पीठ ने मामले पर लिखित आदेश जारी किया। अदालत ने माना कि एसीपी कोर्ट द्वारा लगाई गई शर्त अत्यधिक कठोर है। पीठ ने टिप्पणी की कि कोई भी सरकारी कर्मचारी अपनी नौकरी को लेकर चिंतित रहेगा और वह बंदियों के लिए जमानत बांड नहीं देगा। इस तरह की कठोर शर्त लगाना एक प्रकार से हिरासत में लिए गए लोगों को जमानत देने से इंकार करने के समान है। हाई कोर्ट ने एसीपी कोर्ट को आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं को 50 हजार रुपये के व्यक्तिगत बाउंड और 50 हजार रुपये के एक जमानतदार के आधार पर रिहा किया जाए।