इंदौर जिले में सड़क हादसों का ग्राफ लगातार चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है। प्रशासन और पुलिस द्वारा चिन्हित किए गए दुर्घटना संभावित क्षेत्रों यानी ‘ब्लैक स्पॉट’ पर वाहनों की रफ्तार जिंदगी पर भारी पड़ रही है। आंकड़ों के अनुसार, पिछले साढ़े तीन साल यानी साल 2023 से अब तक जिले के विभिन्न ब्लैक स्पॉट पर कुल 290 सड़क हादसे दर्ज किए गए हैं। इनमें 239 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। पूरे जिले में इस समय कुल 31 ब्लैक स्पॉट चिन्हित हैं, जिनमें से 10 को बेहद खतरनाक श्रेणी में रखा गया है। शहर के वरिष्ठ आर्किटेक्ट अतुल शेठ कहते हैं कि सिर्फ दावे और योजनाएं ही इन हादसों को नहीं रोक सकती। इसके लिए इच्छाशक्ति की जरूरत है। पिछले कई साल से कई बार समितियां बनाई गई, कई तरह की रिपोर्ट तैयार की गई लेकिन फिर भी शहर के हादसों में कमी नहीं आ रही है। प्रशासन और जिम्मेदारों को बेहद गंभीरता के साथ इस पर काम करना होगा, तभी शहर में होने वाले हादसों की संख्या में कमी आएगी।
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अर्जुन बड़ोद में सबसे ज्यादा तबाही, ये हैं 10 सबसे खतरनाक स्थान
जिले के सबसे संवेदनशील और खतरनाक 10 ब्लैक स्पॉट में से अधिकांश राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) पर स्थित हैं। इन सभी में क्षिप्रा का अर्जुन बड़ोद सबसे घातक साबित हुआ है, जहां 29 हादसों में 19 लोगों की मौत हो चुकी है। इसके बाद मानपुर का भेरूघाट (कालिकिराय) दूसरे नंबर पर है, जहां 19 हादसों में 15 लोगों की जान गई है। वहीं खुड़ैल का देवगुराड़िया ट्रेंचिंग ग्राउंड भी बेहद खतरनाक है, जहां 15 हादसों में 14 मौतें दर्ज की गई हैं।
इसके अलावा, रालामंडल चौराहा (13 हादसों में 14 मौतें), इंदौर-अहमदाबाद हाईवे पर मांचल (16 हादसों में 10 मौतें), सिमरोल-भेरूघाट (17 हादसों में 09 मौतें), किशनगंज की टीही पुलिया (14 हादसों में 09 मौतें), लवकुश चौराहा (12 हादसों में 11 मौतें), कैलोद करताल फाटा (12 हादसों में 11 मौतें) और क्षिप्रा का डकाच्चा (12 हादसों में 07 मौतें) ऐसे स्थान हैं जो लगातार खून से लाल हो रहे हैं।
शहर के मुकाबले ग्रामीण हाईवे पर ज्यादा मंडरा रहा है खतरा
अगर आंकड़ों को भौगोलिक आधार पर देखें तो जिले के कुल 31 ब्लैक स्पॉट में से 16 शहर में और 15 ग्रामीण क्षेत्रों में आते हैं। हालांकि, प्रशासन द्वारा शहर के 5 ब्लैक स्पॉट को सुधारात्मक कदमों के बाद सूची से हटा दिया गया है। साल 2026 की पहली छमाही की बात करें, तो इस अवधि में शहर के भीतर हादसों में 10 मौतें हुई हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 12 मौतों का रहा है। साफ है कि ग्रामीण इलाकों के हाईवे पर रफ्तार और भारी वाहनों के दबाव के कारण स्थिति ज्यादा गंभीर है। मानपुर, सिमरोल और मांचल जैसे हिस्सों में आज भी खतरा पूरी तरह टला नहीं है।
सिर्फ रफ्तार ही नहीं, ये खामियां भी हैं हादसों की वजह
पुलिस और विशेषज्ञों की मानें तो इन ब्लैक स्पॉट पर होने वाले हादसों के लिए केवल तेज रफ्तार ही जिम्मेदार नहीं है। इसके पीछे सड़कों की खराब डिजाइन, भारी वाहनों का अत्यधिक दबाव, खतरनाक कट, अपर्याप्त ट्रैफिक प्रबंधन और कई जगहों पर अधूरे पड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट भी बड़ी वजह हैं। हालांकि, पुलिस और संबंधित एजेंसियों ने अधिकांश जगहों पर ‘शॉर्ट टर्म’ (कम समय वाले) सुधार पूरे करने का दावा किया है। वहीं कुछ जगहों पर फ्लाईओवर, ब्रिज, टनल और सड़क चौड़ीकरण जैसे ‘लॉन्ग टर्म’ (दीर्घकालिक) काम जारी हैं। रालामंडल और अर्जुन बड़ोद जैसी जगहों पर ब्रिज बनने के बाद हादसों में कमी आने का दावा जरूर किया जा रहा है।
इंजीनियरिंग के साथ नियमों का पालन भी है जरूरी
इस गंभीर मुद्दे पर कुछ दिन पहले ही जस्टिस ए.एम. सप्रे ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा था कि सड़क हादसों को रोकने के लिए केवल इंजीनियरिंग सुधार ही काफी नहीं हैं। जब तक वाहन चालकों द्वारा ओवर स्पीडिंग रोकने, गलत दिशा में वाहन न चलाने और हेलमेट व सीट बेल्ट जैसे अनिवार्य सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन नहीं किया जाएगा, तब तक ब्लैक स्पॉट की संख्या कम होने के बावजूद मौतों के इस सिलसिले पर पूरी तरह रोक लगाना बेहद मुश्किल होगा।
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