Supreme Court Rejects PIL Challenging 2018 SCST Act Amendment

Supreme Court Rejects PIL Challenging 2018 SCST Act Amendment

नई दिल्ली3 मिनट पहले

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Supreme Court Rejects PIL Challenging 2018 SCST Act Amendment

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को SC/ST एक्ट में 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी।

CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच ने कहा कि संशोधन को सुप्रीम कोर्ट 2020 में ही बरकरार रख चुका है। इसलिए उस फैसले पर दोबारा विचार करने की जरूरत नहीं है।

SC/ST एक्ट में 2018 के संशोधन के तहत अग्रिम जमानत पर लगी रोक बहाल की गई थी। साथ ही FIR से पहले प्रारंभिक जांच और आरोपी की गिरफ्तारी से पहले मंजूरी की जरूरत भी खत्म कर दी गई थी।

याचिकाकर्ता बोले- अग्रिम जमानत देना रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन

बृजभूषण सैनी द्वारा दायर याचिका पर एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने दलील रखी कि SC/ST एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर कानूनी रोक “उल्टा भेदभाव” (रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन) है। इसलिए इन प्रावधानों का दुरुपयोग हो सकता है।

रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन का मतलब है कि अगर किसी वर्ग को विशेष सुविधा दी गई, तो उससे प्रभावित होने वाला दूसरे वर्ग का व्यक्ति कहता है—“इस सुविधा की वजह से मेरे साथ भेदभाव हो रहा है।”

जैन ने इस एक्ट के तहत दर्ज मामलों में कम का भी जिक्र किया और कानूनी योजना के तहत मुआवजा बांटने के तरीके पर सवाल उठाए।

राज्यसभा सदस्य के एक भाषण का हवाला देते हुए, उन्होंने आरोप लगाया कि मुआवजे के तौर पर 493 करोड़ रुपए बांटे गए थे और कहा कि ऐसी व्यवस्था FIR दर्ज करने को बढ़ावा दे सकती है।

SC/ST एक्ट में 2018 में क्या बदला था

मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि SC/ST एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए FIR दर्ज करने से पहले अनिवार्य प्रारंभिक जांच की जानी चाहिए।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी के लिए सक्षम अधिकारी की अनुमति जरूरी होगी और विशेष परिस्थितियों में आरोपी को अग्रिम जमानत दी जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद संसद में कानून आया

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। इसके जवाब में संसद ने ‘अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2018’ पारित किया।

इस संशोधन के जरिए एक्ट में धारा 18A जोड़ी गई, जिसने कोर्ट की अनिवार्य की गई प्रारंभिक जांच और गिरफ्तारी से पहले अनुमति की शर्तों को खत्म कर दिया। अग्रिम जमानत पर रोक को फिर से बहाल कर दिया।

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