Toxic Movie Review :यश का ब्लॉकबस्टर एक्शन और स्वैग भी फिल्म का बंटाधार होने से नहीं बचा पाया

Toxic Movie Review :यश का ब्लॉकबस्टर एक्शन और स्वैग भी फिल्म का बंटाधार होने से नहीं बचा पाया


फिल्म – टॉक्सिक ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन अप्स

निर्माता – के वी एन प्रोडक्शन और मॉन्सटर्स माइंड

निर्देशक- गीतू मोहनदास

कलाकार-यश,कियारा आडवाणी,नयनतारा,तारा सुतरिया,हुमा कुरैशी ,रुक्मिणी वसंत,अक्षय ओबरॉय और अन्य

प्लेटफार्म- सिनेमाघर

रेटिंग-डेढ़

toxic movie review :हिंदी बेल्ट में साउथ के रॉकिंग स्टार यश की पहचान उनकी ब्लॉकबस्टर केजीएफ फ्रेंचाइजी की फिल्मों से रही है.साल 2022 यश की केजीएफ 2 रिलीज हुई थी. लगभग चार साल के लम्बे अंतराल के बाद वह फिल्म टॉक्सिक ए फेयरीटेल फॉर ग्रोन अप्स से लौट आये हैं.इस फिल्म से रॉकिंग स्टार सिर्फ अभिनेता के तौर पर ही नहीं बल्कि निर्माता और लेखक के तौर पर भी जुड़े हुए हैं. उम्मीद थी कि यश का तिगुना फैक्टर टॉक्सिक को एक्शन से भरपूर , धमाकेदार और ब्लॉकबस्टर फिल्म बनाएगी,लेकिन लचर कहानी और स्क्रीनप्ले ने फिल्म का बंटाधार कुछ इस कदर कर दिया है कि यश का स्वैग और अभिनय भी फिल्म को बोझिल बनने से बचा नहीं पाया है.

ये है कहानी

Toxic Movie Review :यश का ब्लॉकबस्टर एक्शन और स्वैग भी फिल्म का बंटाधार होने से नहीं बचा पाया
यश टॉक्सिक, फोटो- इंस्टाग्राम

फ़िल्म की कहानी 1947 के गोवा से शुरू होती है . भारत आजाद हो चुका है. ब्रिटिशर्स चले गए हैं,लेकिन गोवा पर अभी भी पुर्तगाली लोगों का राज है.उन्ही में से एक साल्वाडोर (डेरेल डिसिल्वा )का गोवा के अपराध की दुनिया में एकछत्र राज है.हिंसा का गोवा की गलियों पर बोलबाला है.इस दुनिया को और ज्यादा खून खराबे से गैंगस्टर राया (यश )और उसकी बहन गंगा (नयनतारा ) भर देते हैं.दोनों भाई बहन का बचपन बुरा रहा है,लेकिन बहन गंगा अपने भाई को पूरे गोवा पर राज करते हुए देखना चाहती है.यह राह तब और आसान लगने लगती है, जब साल्वाडोर की बेटी रिबेका (तारा सुतारिया )राया पर दिल हार बैठती है. राया के लिए यह रिश्ता उसकी जरूरतों और बहन की खाव्हिश को पूरा करने का बस जरिया है.वह इमोशनलेस है लेकिन जल्द ही राया की जिंदगी में नाडिया (कियारा आडवाणी )की एंट्री होती है और पहली बार उसे सच्चे प्यार का एहसास होता है.यह प्यार राया में बदलाव लेकर आता है. क्या इस प्यार को राया को बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी.गंगा ,रिबेका और नाडिया का क्या होगा. क्या राया का गोवा में एकछत्र राज हो पायेगा लेकिन उसकी कीमत क्या होगी. यह फिल्म इसी पूरी जर्नी को 1947 से 1967 के टाइम फ्रेम में दिखाती है.

कहानी से ज्यादा स्टाइल और स्वैग पर फोकस

यश सुपरस्टार हैं. उनका अपना स्टाइल,स्वैग और ऑरा है. उनकी पिछली फिल्म केजीएफ में भी कहानी के बजाय स्टाइल और हिंसा पर जोर दिया गया था लेकिन इस बार मामला कहानी के मामले में एकदम नदारद है. तीन घंटे से ज्यादा समय वाली फिल्म को देखते हुए लगता है कि फिल्म में कहानी के बारे में बाद में सोचा गया है, पहले स्टाइलिश दृश्यों के बारे में सोचा गया है.लेडीज वर्सेज लेडीज वाला फाइट सीक्वेंस वैसा ही है. कहीं से भी वह शुरू हो गया था. किरदारों की दुनिया उलझी हुई है.जिन्हे समझने के लिए बहुत धैर्य की जरूरत है और फिर शुरुआत के 40 मिनट धैर्य का इम्तिहान लेती है. कहीं से भी गोली चल रही है. खून खराबा हो रहा है.फिल्म से इमोशन नदारद है. जो किसी भी फिल्म की सबसे बड़ी जरूरत होती है. गंगा ,नाडिया और राया के किरदारों में वह भावनात्मक पहलू था लेकिन उस पर फोकस नहीं किया गया है.आखिर के बीस पंद्रह मिनट कहानी अलग मोड़ लेती है लेकिन तब तक सबकुछ तबाह हो चुका होता है.

रनटाइम तीन घंटे से ज्यादा फिर भी सवाल अधूरे

फिल्म की अवधि सवा तीन घंटे की है लेकिन फिर भी फिल्म की कहानी कई सवालों के जवाब नहीं दे पायी है.राया की मां ने क्यों अपने पति की हत्या कर दी थी.उसका क्या अतीत था. इसका जवाब फिल्म नहीं दे पाती है तो फिल्म के शुरूआती दृश्य में सल्वाडोर के भाई की हत्या राया क्यों यह कहते हुए लेता है कि अपने पिता के लिए नहीं बल्कि अपनी बहन के लिए वह उसे मार रहा है. सल्वाडोर के भाई से राया को इस कदर नफरत क्यों थी कि उसकी राख को कोकीन पाउडर की तरह खींचना चाहता था. राया सिकंदर की तरह है तो उसे गोवा पर राज करने के लिए रिबेका से शादी करने की क्यों जरूरत थी.वह तो पहले भी सल्वाडोर के साम्राज्य को अकेले ही खत्म कर सकता था.फिल्म इन पहलुओं पर बात नहीं करती है.

महिला निर्देशक फिल्म की उपलब्धि लेकिन महिला किरदार नाकाम

यह भारतीय सिनेमा की सबसे महंगी फिल्मों में से एक है. फिल्म का बजट और इसका एक्शन जॉनर होना आमतौर पर इसे भारतीय सिनेमा में महिला निर्देशकों की पहुँच से दूर कर देता है लेकिन इस फिल्म के निर्देशन की कमान महिला निर्देशक गीतू मोहनदास को मिली है. जो इस फिल्म की उपलब्धि है लेकिन जिस तरह से महिला किरदारों को ओब्जेक्टिफाय किया गया है. वह अखरता है.महिला निर्देशक के होते हुए महिला किरदारों की प्रस्तुति आय कैंडी के तौर पर ही हुई है. उनकी दुनिया पुरुषों के इर्द गिर्द सिमटी है. रुक्मिणी वसंत और यश के किरदार के बीच एक संवाद है “लोग लड़ते हुए मरते हैं हम एक दूसरे के चढ़कर मरेंगे”. वह बेहूदा है.महिला फाइटर्स के साथ एक्शन का एक पूरा सीक्वेंस है लेकिन उसमें भी उन्हें सेक्स ओब्जेक्टिफाय की तरह ट्रीट किया है. फाइट के सीक्वेंस हो या फिर डायलॉग.

तकनीकी पक्ष शानदार

फिल्म का हर फ्रेम में भव्यता का ख्याल रखा गया है तो तकनीकी पक्ष शानदार होना ही था. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी शानदार है.गोवा हो या मकाउ परदे पर हर तरफ भव्यता है.विंटेज लुक फिल्म को एक अलग टच देता है. सूट बूट और लम्बे जैकेट पहने हुए किरदार इस फिल्म को हॉलीवुड वाला टच देते हैं.सर्कस का सीक्वेंस भी भव्यता लिए हुए हैं.वीएफएक्स में ऑस्कर विनिंग कम्पनी का नाम जुड़ा है तो परदे पर सबकुछ परफेक्ट होना ही था. भव्यता के चक्कर में लेकिन कहानी ही नहीं लॉजिक को भी ताक पर रख दिया गया है. गोवा पर फिल्म बेस्ड है. फिल्म क्लाइमेक्स में जबरदास्त बर्फीली वादियों में कैसे पहुँच जाती है.यह बात समझ नहीं आती है.

संवाद और म्यूजिक में भी नहीं बनी बात

फिल्म के ट्रीटमेंट में स्लो मोशन , बैकग्राउंड म्यूजिक और एटीट्यूड को संवाद से ज्यादा तवज्जो दी गयी है.फिल्म की हिंदी डबिंग बहुत स्लो है.संवाद कम है.जो हैं भी उनमें लाउडनेस भर भर के दी गयी है. यश के स्वैग वाले डायलॉग को छोड़ दें तो फिल्म में जमकर किरदार संवाद बोलते हुए चीखते चिल्लाते नज़र आते हैं. फिल्म के दूसरे पहलू में बीजीएम अच्छा है लेकिन गीत संगीत में तबाही के अलावा कोई भी ट्रैक याद नहीं रह पाता है.

यश का दूसरा अवतार चौंकाता है

अभिनय की बात करें तो यह यश की फिल्म है. हर फ्रेम में वह राया के किरदार को स्टाइल और स्वैग से ख़ास बनाते हैं तो टिकट की भूमिका में वह चौंकाते हैं. जिस तरह से उन्होंने दोनों किरदारों को अलग हाव भाव और व्यक्तित्व से जिया है. वह अभिनेता के तौर पर उनके रेंज को दर्शाता है. नयनतारा प्रभावी रही हैं. कियारा आडवाणी ,हुमा कुरैशी और तारा सुतारिया का किरदार ठीक ठाक है तो रुक्मिणी वसंत के किरदार के लिए करने को कुछ खास नहीं था. अक्षय ओबेरॉय और बाकी के किरदारों ने भी अपनी सीमित भूमिकाओं के साथ न्याय किया है.

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