राज्यसभा चुनाव: कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन जिस आधार पर रद्द हुआ, वो कितना सही है?

राज्यसभा चुनाव: कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन जिस आधार पर रद्द हुआ, वो कितना सही है?

मीनाक्षी नटराजन

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इमेज कैप्शन, मीनाक्षी नटराजन ने कहा कि बीजेपी ने पर्याप्त वोट न होने के बावजूद तीसरा उम्मीदवार उतारा था और पहले से अंदेशा था कि रास्ते में बाधाएं खड़ी की जाएंगी
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मध्य प्रदेश में 18 जून को होने वाले राज्यसभा चुनाव का समीकरण उस समय बदल गया, जब कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन जांच के दौरान ख़ारिज कर दिया गया.

रिटर्निंग ऑफिसर अरविंद शर्मा ने बीजेपी की आपत्ति स्वीकार करते हुए नामांकन रद्द कर दिया.

बीजेपी का आरोप था कि नटराजन ने तेलंगाना में लंबित एक मामले की जानकारी अपने नामांकन पत्र में नहीं दी थी.

कांग्रेस ने इस फ़ैसले को अवैध बताया है और आरोप लगाया है कि बीजेपी ने पर्याप्त संख्या न होने के बावजूद तीसरी राज्यसभा सीट हासिल करने के लिए साज़िश रची है.

चुनावी नियम के अनुसार, नामांकन जांच की प्रक्रिया के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर के फ़ैसले को चुनाव आयोग नहीं पलट सकता है.

इस चुनाव में दांव पहले से ही ऊंचे थे क्योंकि बीजेपी ने महेश केवट को तीसरे उम्मीदवार के रूप में उतारकर चौंका दिया था.

कांग्रेस ने अपने विधायकों को बेंगलुरु शिफ्ट कर दिया था. उसे डर था कि कहीं विधायकों को बीजेपी अपने पक्ष में ना कर ले. लेकिन यहाँ मामला कुछ और ही हो गया.

कांग्रेस की आशंका केवल राजनीतिक बयानबाज़ी पर आधारित नहीं है थी बल्कि उसके पीछे छह साल पुराना एक बड़ा राजनीतिक अनुभव भी है.

2020 में मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार उस समय गिर गई थी जब ज्योतिरादित्य सिंधिया और कांग्रेस के 22 विधायकों ने पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया था.

उस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति का पूरा समीकरण बदल दिया और बीजेपी की सत्ता में वापसी का रास्ता साफ़ कर दिया था.

मध्य प्रदेश में कांग्रेस के लिए यह अब भी सबसे बड़े राजनीतिक झटकों में से एक माना जाता है.

इसी वजह से राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस किसी भी संभावित टूट-फूट, क्रॉस-वोटिंग या राजनीतिक दबाव को लेकर अतिरिक्त सतर्कता दिखा रही थी.

मीनाक्षी नटराजन

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इमेज कैप्शन, कांग्रेस का कहना है कि इसी आधार पर वह चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी

बीजेपी के तीनों उम्मीदवार जीत जाएंगे

230 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के 164 विधायक हैं, जिससे वह दो सीटें आराम से जीत सकती है.

एक उम्मीदवार को जीत के लिए 58 वोटों की ज़रूरत होती है. ऐसे में तीसरे उम्मीदवार की जीत अतिरिक्त वोटों, क्रॉस-वोटिंग या विपक्षी सदस्यों के मतदान से दूर रहने पर निर्भर थी.

पूरे मामले पर मीनाक्षी नटराजन ने कहा, “बीजेपी ने पर्याप्त वोट न होने के बावजूद तीसरा उम्मीदवार उतारा था और हमें पहले से अंदेशा था कि रास्ते में बाधाएं खड़ी की जाएंगी. पहले एसआईआर के ज़रिए वोट चुराए जा रहे हैं, अब सीटें चुराई जा रही हैं. हम यह लड़ाई हर लोकतांत्रिक और संवैधानिक मंच पर लड़ेंगे.”

अगर कांग्रेस को चुनाव आयोग या सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत नहीं मिलती है तो अब स्थिति ऐसी बन सकती है कि तीन ख़ाली सीटों के लिए बीजेपी के तीन उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो जाएं.

अधिकारियों का कहना है कि मीनाक्षी नटराजन को नामांकन में बाक़ी जानकारी देने का अवसर दिया गया था, लेकिन वह ज़रूरी विवरण उपलब्ध नहीं करा सकीं.

इसके बाद कारणों का उल्लेख करते हुए उनका नामांकन रद्द कर दिया गया.

कांग्रेस ने इस व्याख्या का विरोध किया है.

मीनाक्षी नटराजन के नामांकन को लेकर अब विवाद का केंद्र एक क़ानूनी सवाल बन गया है. क्या हैदराबाद की अदालत से जारी नोटिस का उल्लेख नामांकन पत्र में करना अनिवार्य था?

कांग्रेस का कहना है कि ऐसा नहीं था. कांग्रेस के क़ानूनी प्रकोष्ठ के प्रतिनिधि अजय गुप्ता के अनुसार, यह मामला भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 223 से जुड़ा था और इसे सामान्य आपराधिक मुक़दमे की तरह नहीं देखा जा सकता.

उनका तर्क है कि नटराजन के ख़िलाफ़ कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं हुई थी और न ही अदालत ने किसी आपराधिक मुक़दमे में आरोप तय किए थे. केवल एक नोटिस जारी हुआ था, जिसका जवाब उनकी ओर से दिया जा चुका था. इसलिए नामांकन पत्र में इसका उल्लेख करना अनिवार्य नहीं था.

कांग्रेस का कहना है कि इसी आधार पर वह चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी.

वहीं बीजेपी इस तर्क को ख़ारिज कर रही है.

बीजेपी के क़ानूनी प्रकोष्ठ के सदस्य संकेत गुप्ता का कहना है कि मामला केवल एफ़आईआर तक सीमित नहीं है. अगर किसी मामले में अदालत की ओर से समन या नोटिस जारी हो चुका है और उम्मीदवार को उसकी जानकारी है देनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि मीनाक्षी नटराजन यह नहीं कह सकतीं कि उन्हें मामले की जानकारी नहीं थी क्योंकि हैदराबाद की अदालत से जारी नोटिस का जवाब उनकी ओर से दिया गया था.

यानी पूरा विवाद इस बात पर टिका है कि अदालत के नोटिस और लंबित मामले की जानकारी चुनावी हलफ़नामे में देनी चाहिए थी या नहीं. कांग्रेस इसे केवल एक क़ानूनी नोटिस बता रही है, जबकि बीजेपी का दावा है कि इसे छिपाना नामांकन संबंधी नियमों का उल्लंघन है.

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इमेज कैप्शन, कांग्रेस नेता सचिन पायलट और केसी वेणुगोपाल चुनाव आयोग के बाहर धरने पर बैठ गए हैं

आधार कितना सही?

भोपाल में विधानसभा सचिवालय में इस आपत्ति को लेकर काफ़ी हंगामा देखने को मिला. कांग्रेस और बीजेपी के दर्जनों कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए और दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई.

बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता और विधायक, जिनमें कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह और कैलाश विजयवर्गीय भी शामिल थे, पूरी कार्यवाही के दौरान विधानसभा सचिवालय में मौजूद रहे.

कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील विवेक तनखा ने एक्स पर लिखा, “मीनाक्षी नटराजन के नामांकन को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है. कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं हुआ है. केवल एक नोटिस मिला है, जिसमें पूछा गया है कि उनके और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ दस करोड़ रुपये के मुआवजे की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए. मीनाक्षी जी के वकील ने इस नोटिस का जवाब दे दिया है. कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं हुई है.”

केसी वेणुगोपाल

मीनाक्षी नटराजन ने आरोप लगाया कि जब बीजेपी को अहसास हो गया कि कांग्रेस के विधायक एकजुट हैं, तब उसने क़ानूनी नोटिस की आड़ में उनके नामांकन को चुनौती दी.

उन्होंने कहा, “जब उन्हें लगा कि यह एकजुट सदन है, तब एक ऐसे कानूनी नोटिस के आधार पर, जिस पर संज्ञान तक नहीं लिया गया था, मेरे नामांकन को चुनौती दी गई. हमारे वकीलों ने अपने तर्क रखे, लेकिन उन्हें न तो ठीक से सुना गया और न ही उन पर विचार किया गया. इसके बावजूद फैसला सुना दिया गया. इससे उनकी मंशा साफ हो गई है.”

इस बीच कांग्रेस ने चुनाव आयोग का दरवाज़ा खटखटाने की कोशिश की. देर शाम के.सी. वेणुगोपाल, सचिन पायलट और भूपेश बघेल सहित कांग्रेस का एक प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग के कार्यालय पहुंचा, लेकिन उन्हें अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई.

के.सी. वेणुगोपाल ने पत्रकारों से कहा, “यह लोकतंत्र का बुनियादी सवाल है. जब तक हमें अंदर जाने की अनुमति नहीं मिलेगी, हम यहीं बैठे रहेंगे. यहां पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व उपमुख्यमंत्री और सांसद मौजूद हैं. हम ज़िम्मेदार लोग हैं.”

चुनाव आयोग ने कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल के साथ बुधवार दोपहर बैठक निर्धारित की है. उधर मुख्यमंत्री मोहन यादव ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेताओं ने मीनाक्षी नटराजन से जुड़े मामले की जानकारी साज़िश के तहत छिपाई थी.

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इमेज कैप्शन, रिटर्निंग ऑफिसर के फ़ैसले को चुनाव आयोग के लिए पलटना भी आसान नहीं होगा

बीजेपी के उम्मीदवार कौन हैं?

उन्होंने कहा, “यह मामला उनकी जानकारी में था. जब आज सुनवाई के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर ने यह जानकारी उनके सामने रखी, तो उन्होंने इसे स्वीकार भी किया. इसका मतलब है कि उन्होंने जानबूझकर रिटर्निंग ऑफिसर को अंधेरे में रखा. उसी आधार पर यह फ़ैसला आया है. मैं जांच-पड़ताल की इस प्रक्रिया का स्वागत करता हूँ.”

राज्यसभा की तीन सीटों में से दो पर बीजेपी की जीत लगभग तय मानी जा रही है. दो सीटें जीतने के बाद भी बीजेपी के पास 48 विधायकों के वोट बचते हैं.

महेश केवट की उम्मीदवारी रविवार देर रात कई दौर की चर्चाओं के बाद घोषित की गई थी, क्योंकि तीसरी सीट जीतने के लिए बीजेपी ज़रूरी संख्या से 10 वोट कम थे.

मध्य प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस के पास 62 वैध वोट हैं. बीजेपी के दो उम्मीदवार जिनकी जीत लगभग सुनिश्चित मानी जा रही है, वे पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ और प्रदेश इकाई के सचिव रजनीश अग्रवाल हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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