अर्थव्यवस्था को संकट में तो नहीं डाल देगी किफ़ायत की प्रधानमंत्री की अपील? जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ – द लेंस

अर्थव्यवस्था को संकट में तो नहीं डाल देगी किफ़ायत की प्रधानमंत्री की अपील? जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ – द लेंस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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इमेज कैप्शन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए देशवासियों से अपील की है

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ईरान जंग शुरू होने पर कई विशेषज्ञों का मानना था कि अगर यह लंबा चला तो दुनिया भर में लोगों के इस्तेमाल की चीज़ों की क़ीमतें बढ़ेंगी और महंगाई एक बड़ी समस्या बन सकती है.

होर्मुज़ स्ट्रेट के बंद होने के बाद से आशंका जताई जाती रही है कि भारत में भी तेल और गैस की कमी हो सकती है.

पिछले महीने देश में रसोई गैस के लिए बहुत से लोग समय से सिलेंडर नहीं मिलने की शिकायत करते दिखे. इस पूरे दौर में पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में बहुत बड़ी बढ़ोतरी देखने को नहीं मिली. सरकार ने उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए पेट्रोल और डीज़ल पर एक्साइज़ ड्यूटी घटा दी.

लेकिन इस हफ़्ते अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक अपील की. उन्होंने लोगों से पेट्रोल और डीज़ल की खपत कम करने, पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाने, अनावश्यक विदेश यात्राओं से बचने, एक साल तक सोना न ख़रीदने, घर से काम करने और किसानों से रासायनिक खाद का इस्तेमाल 50 फ़ीसदी तक कम करने की अपील की है.

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विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री की यह अपील भारतीय अर्थव्यवस्था में किसी बड़े संकट की ओर इशारा कर सकती हैं.

जो रुपया संघर्ष शुरू होने के समय डॉलर के मुकाबले लगभग 91 पर था, वह अब गिरकर ऐतिहासिक स्तर यानी 95 रुपये प्रति डॉलर से भी नीचे पहुंच गया है.

अब तक बढ़ती तेल क़ीमतों का बोझ ज़्यादातर सरकार उठा रही थी.

लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जल्द ही इसका असर सीधे कंज्यूमर पर दिखना शुरू हो सकता है. फ़र्टिलाइज़र्स की कमी और यूरिया-अमोनिया की बढ़ती क़ीमतों के चलते खाने-पीने की चीज़ें भी महंगी हो सकती हैं.

क्यों पीछे रह गया भारत?

द लेंस
इमेज कैप्शन, कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा ने द लेंस में प्रधानमंत्री की अपील के संभावित असर पर विशेषज्ञों से चर्चा की

कोटक महिंद्रा बैंक के संस्थापक उदय कोटक ने चेतावनी दी है कि लोगों को ‘बेहद खराब परिस्थितियों’ के लिए तैयार रहना चाहिए.

हालांकि सिर्फ़ भारत ही ऐसा नहीं कर रहा. युद्ध शुरू होने के बाद कई देशों ने अपने उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था पर असर कम करने के लिए कई कदम उठाए.

चीन ने अपनी तेल रिफ़ाइनरियों को अस्थायी रूप से ईंधन निर्यात रोकने का आदेश दिया. इसके बावजूद पेट्रोल की क़ीमतें बढ़ीं और कुछ चीनी एयरलाइंस ने जेट फ़्यूल महंगा होने के कारण उड़ानें कम कर दीं.

ऑस्ट्रेलिया के कुछ राज्यों ने लोगों को गाड़ी कम चलाने के लिए बढ़ावा देने के मक़सद से पब्लिक ट्रांसपोर्ट मुफ़्त कर दिया या किराया आधा कर दिया.

फिलिपींस ने मार्च में राष्ट्रीय इमरजेंसी घोषित की. श्रीलंका ने भी ईंधन राशनिंग लागू की.

ऐसे मे सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत ने इस दिशा में अब तक क्यों बड़े क़दम नहीं उठाए? और विपक्ष सवाल उठा रहा है कि सरकार चुनाव के चलते चुप थी?

द लेंस में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा ने इस विषय पर चर्चा की पूर्व वित्त सचिव अशोक झा, आर्थिक मामलों के वरिष्ठ पत्रकार और द एन शो के एडिटर नीरज बाजपेई और अर्थशास्त्री डॉक्टर दीपा सिन्हा से.

फ़ॉरेन एक्सचेंज बचाना ज़रूरीः अशोक झा

पूर्व वित्त सचिव कहते हैं कि सोचना होगा कि एफ़पीआई को पैसा बाहर ले जाने से कैसे रोक सकते हैं

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प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद अभी की परिस्थिति में स्थिति कितनी चिंताजनक लगती है, इस सवाल के जवाब में पूर्व वित्त सचिव अशोक झा ने कहा कि अभी हालात उतने चिंताजनक नहीं हैं.

उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री ने जो कहा है वह एक अपील है लोगों से कि फ़ॉरेन एक्सचेंज का मामला गंभीर हो सकता है. अगर पश्चिम एशिया का युद्ध चलता रहा और उससे फ़ॉरेन एक्सचेंज रिज़र्व पर असर पड़ता रहा तो कुछ दिनों बाद या एक महीने बाद मामला गंभीर हो सकता है.”

“इसलिए उन्होंने जो कहा है उसका एक ही महत्व है- फ़ॉरेन एक्सचेंज को बचाकर रखिए, उसे मत गंवाइए. इसीलिए उन्होंने कहा कि सोना मत खरीदिए, वर्क फ्रॉर्म होम कीजिए ताकि ईंधन कम ख़र्च हो जाता है.”

प्रधानमंत्री की अपील के बाद सोशल मीडिया पर आम लोग यह सवाल उठा रहे थे कि सरकार खुद अगर ज़्यादा ख़र्च करती हुई दिखती है… नेता, मंत्री, सांसद इस तरह से ख़र्च करते हुए दिखते हैं तो जनता को यह सिर्फ़ एक नसीहत जैसा लगता है, वास्तविक संकट नहीं लगता.

इस पर अशोक झा कहते हैं, “गोल्ड की बात करते हैं… यह ऐसी चीज है, जो भारतीय मानसिकता में सांस्कृतिक रूप से गुथा हुआ है. इसलिए सिर्फ़ अपील करने से इसकी ख़रीदारी कम नहीं होगी.”

“ऐसे में उन्होंने गोल्ड की ड्यूटी बढ़ाकर 6% से 15% कर दिया है. लेकिन मैं नहीं समझता हूं कि इसका कोई ख़ास असर पड़ेगा क्योंकि किसी न किसी तरह से लोग सोना खरीदेंगे ही शादी के लिए और दूसरे त्योहारों के लिए.”

“लेकिन इसका एक अनचाहा परिणाम यह होगा कि इसकी तस्करी बढ़ जाएगी. आपको शायद याद होगा कि 1990 के दशक में गोल्ड की ड्यूटी दो प्रतिशत कर दी गई थी तो स्मगलिंग काफी हद तक बंद हो गई थी.”

उन्होंने कहा, “अब दो प्रतिशत से बढ़ाकर छह प्रतिशत कर दिया और अब छह प्रतिशत से 15 प्रतिशत हो गया, यह एक अनचाहा परिणाम है.”

अशोक झा

जब किसी भी तरह की आर्थिक अनिश्चितता होती है तो कहा जाता है कि सरकार को अपना ख़र्च थोड़ा बढ़ाना चाहिए ताकि लोगों में यह विश्वास रहे कि हालात ठीक हैं या ठीक चलने वाले हैं.

लेकिन मौजूदा हालात में सरकार अगर हाथ खींचती हुई दिखेगी तो उसका पूरी आर्थिक वृद्धि पर क्या असर होगा, इस पर पूर्व वित्त सचिव कहते हैं कि सिर्फ़ विदेश मुद्रा भंडार को कम ख़र्च करने से ही बात नहीं बनने वाली.

वह कहते हैं, “हमें चाहिए यह कि विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़े और वह फ़ॉरेन डायरेक्ट इंवेस्टमेंट (एफ़डीआई) और फॉरेन पोर्टफ़ोलियो इंवेस्टमेंट (एफ़पीआई) से देश में आता है. तो इन दोनों चीजों को नीतियों के साथ बढ़ाना चाहिए.”

“जैसे एफ़डीआई पिछले दो तीन साल में नकारात्मक रहा है. यह या तो रुका हुआ है या फिर नकारात्मक दिशा में जा रहा है. ऐसा क्यों रहा है. इसकी पड़ताल कर इस स्थिति को रोकने के उपाय करने चाहिए. ताकि हमारा नेट एफ़डीआई बढ़ जाए.”

उन्होंने कहा, “इसी तरह पिछले कुछ महीनों से एफ़पीआई भी देश से पैसे बाहर ले जा रहे हैं, हमें यह भी सोचना होगा कि उन्हें कैसे रोक सकते हैं… हमें लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स को भी देखना चाहिए. इसी तरह एफ़डीआई के लिए द्विपक्षीय निवेश समझौते थे, उनमें कुछ दिक्कतें थीं पहले, उनको कैसे सुधारा जाए यह सब भी देखना चाहिए.”

‘विकास दर पर पड़ेगा असर’

नीरज बाजपेई

प्रधानमंत्री की लोगों से अपील को अनुशासन बनाए रखने वाले बयान के रूप में भी देखा जा रहा है लेकिन जो परिस्थितियां हैं उन्हें देखें तो क्या यह अनुशासन संकट में बदल सकता है?

इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार और ‘द एन शो’ के एडिटर नीरज बाजपेई कहते हैं, “मुझे थोड़ा संदेह है कि प्रधानमंत्री की बचत की अपील से कोई बड़ा फ़ायदा हो पाएगा क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था बहुत अधिक ख़र्च करने वाली अर्थव्यवस्था नहीं है. हम हमेशा से न्यूनतम ज़रूरतें पूरी करने वाली अर्थव्यवस्था रहे हैं.”

“अगर आप अनुपात देखें तो 30% पेट्रोल इस्तेमाल होता है और 70% डीज़ल का और डीज़ल ज़रूरत आधारित है. डीज़ल वाली गाड़ियां बहुत ज़्यादा नहीं हैं जिसको कम करने से बहुत फ़र्क पड़ेगा और वहीं पेट्रोल में भी बहुत कम कर लें तो भी ज़्यादा फर्क नहीं पड़ेगा.”

“दूसरा भारत की जनता जब तक बहुत ज़्यादा आर्थिक दबाव न पड़े, वह मानती नहीं है. तो मुझे नहीं लगता कि ये कदम बहुत ज़्यादा काम करेंगे.”

बाजपेई कहते हैं, “सार्वजनिक यातायात की हालत पहले ही ख़राब है तो इंसान मज़बूरी में ही इस्तेमाल कर रहा है. लोगों के पास ऑप्शन की कमी है. इस अपील का उद्देश्य तो बहुत अच्छा है लेकिन पहले से ही लोग इतने न्यूनतम पर इस्तेमाल कर रहे हैं कि नहीं लगता कि बहुत कमी की जा सकती है.”

जहां तक लोगों को थोड़ा संभल के ख़र्च करने की बात की जा रही है तो इसका देश की आर्थिक वृद्धि दर, या तेज गति से बढ़ने की संभावनाओं पर दीर्घकालिक असर क्या होगा, इस पर नीरज बाजपेई का कहना है कि दीर्घकाल में बहुत ख़राब असर होगा.

वो कहते हैं, “किफ़ायत या कम ख़र्च करने का कदम सुनने में भले ही अच्छा लगता हो लेकिन इससे जीएसटी भी घटेगा. अगर मैं दिन में तीन बार कोई चीज़ इस्तेमाल कर रहा था और आप कहोगे कि एक ही बार करो…”

“ठीक है, हम एक बार करेंगे तो दो बार का जीएसटी भी कम देंगे. तो आपका जो मासिक जीएसटी संग्रह है, वह भी घटेगा. इसलिए वृद्धि पर तो असर आना ही है, किफ़ायत वाले कदम से भी आएगा और तेल की वजह से जो प्रभाव पड़ रहा है, वह भी होगा.”

वह आगे कहते हैं, “इसका असर हो भी रहा है. क़ीमतों की वजह से फ़िरोज़ाबाद की कांच की फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं, कोयंबटूर में फैक्ट्रियां बंद हो रही हैं. मोरबी की टाइल की फ़ैक्ट्रियां बंद हो रही हैं क्योंकि एनर्जी हम दे नहीं पा रहे हैं.”

“और एनर्जी इतनी महंगी हो रही है कि अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पहले से ही हो रहा है. याद कीजिए कि सरकार ने जीएसटी कम क्यों किया था क्योंकि वह उपभोग बढ़ाना चाहती थी और अब आप उपभोग ही कम करने को कह रहे हैं तो जीएसटी मिलना भी कम हो जाएगा.”

मध्यम वर्ग और खेती को मज़बूत करने की ज़रूर- दीपा सिन्हा

कृषि क्षेत्र में बहुत सारा आधारभूत ढांचा विकसित करने की ज़रूरत है ताकि किसान प्राकृतिक खेती कर पाएं

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प्रधानमंत्री की अपील का आम लोगों की ज़िंदगी पर का क्या असर होगा, इस पर अर्थशास्त्री डॉक्टर दीपा सिन्हा को लगता है- नहीं.

वह कहती हैं, “अपील में जो चीज़ें बोली गई हैं, उनमें से कुछ का तो आम आदमी पर असर ही नहीं पड़ता है, जैसे-विदेश की यात्रा न करें. आम इंसान भारत में ऐसे भी विदेश यात्रा करने की स्थिति में नहीं है. या वर्क फ्रॉम होम करें- क्योंकि हमारे देश में लगभग 80-90% लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं जिसमें कहां से काम करेंगे, किस समय में काम करेंगे वह उनके हाथ में नहीं है.”

“इसके अलावा आम इंसान ऐसे भी सार्वजनिक यातायात का ही इस्तेमाल करता है और सोना भी तभी खरीदेंगे जब उतना पैसा होगा. जिस तरह से सोने की क़ीमत बढ़ी है, वह ज़्यादातर आम लोग खरीद नहीं पा रहे हैं.”

“मुझे लग रहा है कि ये अपील वास्तव में अमीर लोगों से की जानी चाहिए थी कि प्राइवेट जेट में यात्रा न करें, विदेश यात्रा पर न जाएं, शायद अपने बच्चों को बाहर पढ़ने के लिए न भेजें. ये सारी चीजें हमारे देश के ऊपरी 10 से 20% लोगों तक ही सीमित है, जो आम आदमी है वह पहले से ही ये सब कर रहा है मजबूरी में.”

“वह कितना ही तेल खा पा रहे हैं या सोना खरीद पा रहे हैं? वह अभी भी बहुत अच्छा स्थिति में नहीं हैं. हालांकि अंततः तेल की क़ीमतें तो बढ़ेंगी तो भार आम आदमी ही पड़ेगा.”

क्या मध्यम वर्ग को चिंतित होने की ज़रूरत है? इसके जवाब में दीपा सिन्हा कहती हैं, “मुझे लगता है कि अर्थव्यवस्था जिस स्थिति में है, उसमें मध्यम वर्ग को उसके बारे में चिंतित होने की ज़रूरत है. एक तो अभी का संकट है क्योंकि पश्चिम एशिया में युद्ध चल रहा है.”

“लेकिन पिछले 10 साल का डेटा हम लोग देख लें तो वेतनभोगी मध्यम वर्ग का वास्तविक वेतन पिछले न के बराबर बढ़ा है. ऐसे में अगर तेल और दूसरी ज़रूरी चीज़ों के दाम बढ़ेंगे तो उन पर असर पड़ेगा.”

वो कहती हैं, “सोना हमारे देश में एक अलग तरह की चीज़ है. महिलाएं ज़्यादातर अपनी सेविंग्स सोने पर लगाती हैं, क्योंकि एक तरह से उनका नियंत्रण रहता है उस पर, या शादी-विवाह सोना लेने-देने की परंपरा है. लेकिन मध्यम वर्गीय परिवारों में इसे लेकर बहुत ज़्यादा संभावना नहीं है तो अगर सोने का दाम बढ़ेगा, जो होना ही है, तो उन पर दबाव बढ़ेगा ही.”

दीपा सिन्हा

भविष्य को देखते हुए वह क्या कदम उठाए जाने चाहिएं जो दीर्घकाल में भारतीय अर्थव्यवस्था को फ़ायदा पहुंचाएंगे?

इस पर दीपा सिन्हा कहती हैं, “मोटे तौर पर देखें तो दो चीज़ें हैं… पहली तो है रोज़गार. एक तो हमारी अर्थव्यवस्था उतनी नौकरियां पैदा नहीं कर पा रही जितनी की ज़रूरत है, दूसरा जिस तरह की नौकरियां आ रही हैं उनमें भी वेतन कम है, सोशल सिक्योरिटी नहीं है.”

“अगर हम यह सुनिश्चित कर पाएं कि लोगों के रेगुलर नौकरी हो और महंगाई के साथ-साथ उनका वेतन बढ़ता होतो बहुत सारे लोग ऐसे झटकों को खुद ही झेल पाएंगे.”

वह कहती हैं, “दूसरी चीज़ है कि खेती के क्षेत्र में जो सुधार होने हैं उन पर भी ध्यान देने की बहुत ज़रूरत है. आर्गेनिक फ़ार्मिंग की बात कही है प्रधानमंत्री ने लेकिन अभी हमारी खेती फ़र्टिलाइज़र्स पर बहुत निर्भर है.”

“अगर किसान प्राकृतिक खेती करना चाहे तो उसमें घाटा है. जितना ख़र्च है उससे कम उन्हें बिक्री मूल्य मिलता है. इसके लिए कृषि क्षेत्र में बहुत सारा आधारभूत ढांचा विकसित करने की ज़रूरत है ताकि किसान आर्गेनिक फ़ार्मिंग कर पाए.”

“इसी तरह खाने का तेल कम करने वाली सलाह है. 40 साल पहले भारत में बाहर से नहीं आता था खाने का तेल, हम उसका उत्पादन खुद करते थे. अलग-अलग प्रांतों में हम जो सरसों, मूंगफली आदि के अलग-अलग तेल खाते थे उसके जगह पाम ऑयल, सोया ऑयल जैसी चीज़ों ने ले ली है जो विदेशी हैं और आयात करने पड़ते हैं.”

दीपा सिन्हा ने कहा कि ‘क्रूड ऑयल तो हमारे पास नहीं है लेकिन खाने के तेल का तो हम उत्पादन कर सकते हैं, उसके लिए नीति बनानी चाहिए.’

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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