इंदौर के डेली कॉलेज पर सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी- ओल्ड डेलियंस को स्कूल संचालन में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं

इंदौर के डेली कॉलेज पर सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी- ओल्ड डेलियंस को स्कूल संचालन में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं

सुनवाई के दौरान न्यायालय की इस स्पष्ट टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से स्पेशल लीव पिटीशन वापस लेने का निवेदन किया गया। जिसे न्यायालय ने स्वीका …और पढ़ें

Publish Date: Mon, 01 Jun 2026 09:23:24 PM (IST)Updated Date: Mon, 01 Jun 2026 09:30:34 PM (IST)

इंदौर के डेली कॉलेज पर सुप्रीम कोर्ट ने की टिप्पणी- ओल्ड डेलियंस को स्कूल संचालन में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं
सुप्रीम कोर्ट

नईदुनिया प्रतिनिधि,इंदौर। डेली कॉलेज से जुड़े लंबे समय से चल रहे विवादों और लगातार न्यायिक चुनौतियों के बीच सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ओल्ड डेलियंस को स्कूल संचालन में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है।

विक्रम खंडेलवाल द्वारा दायर स्पेशल लीव पिटीशन पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति नरसिम्हा एवं न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने टिप्पणी की कि कॉलेज में अध्ययन कर चुके एल्युमिनाई अथवा ओल्ड डेलियंस को संस्था के प्रशासनिक संचालन में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप या संचालनात्मक अधिकार प्राप्त नहीं हैं।

सुनवाई के दौरान न्यायालय की इस स्पष्ट टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से स्पेशल लीव पिटीशन वापस लेने का निवेदन किया गया। जिसे न्यायालय ने स्वीकार करते हुए याचिका वापस लेने की अनुमति प्रदान की तथा प्रकरण को निरस्त कर दिया।

संस्था की ओर से अधिवक्ता विजय आसुधानी एवं रक्षित आसुधानी ने पैरवी की। कई माह से डेली कॉलेज के प्रशासनिक ढांचे, बोर्ड की वैधानिकता तथा संचालन व्यवस्था को लेकर विभिन्न मंचों पर लगातार प्रश्न खड़े किए जा रहे थे। सर्वोच्च न्यायालय की यह स्पष्ट टिप्पणी इस बात को रेखांकित करती है कि किसी भी शैक्षणिक संस्था का संचालन उसके विधिसम्मत संवैधानिक ढांचे और वैधानिक प्रशासनिक तंत्र के अंतर्गत ही संचालित होता है।

कॉलेज के सदस्यों ने कहा कि यह निर्णय केवल कानूनी राहत नहीं, बल्कि संस्था की 155 वर्ष पुरानी गरिमा, स्वायत्तता और प्रशासनिक स्थिरता की पुनर्पुष्टि है।

वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि पूर्व छात्रों द्वारा दायर स्पेशल लीव पिटीशन पर सुनवाई के दौरान न्यायालय प्रकरण को ग्रीष्मावकाश के बाद सुनवाई कर रहा था। इसपर स्वेच्छा से याचिका वापस ली है। न्यायालय ने प्रकरण पर अंतिम निर्णय नहीं दिया और न ही किसी विवादित अधिकार अथवा प्रश्न का अंतिम निस्तारण किया।

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