मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को पत्र लिखा है।
सुप्रीम कोर्ट को लेकर दिए एक बयान के मामले में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इंदौर महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को पत्र लिखकर दिग्विजय सिंह के खिलाफ ‘कंटेंट ऑफ कोर्ट एक्ट 1971’ की धारा 15 (1)(b) के
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महापौर ने साक्ष्य के रूप में न्यूज एजेंसी पीटीआई को दिए उस वीडियो इंटरव्यू की पेन ड्राइव भी सौंपी है। इसमें दिग्विजय सिंह ने शीर्ष अदालत को कथित तौर पर “चोर” कहा था। महापौर ने कहा कि दिग्विजय सिंह ने इंटरव्यू में कहा था..

मालूम था कि जो चोरी हुई है तो चोरी में सभी शामिल हैं, न केवल राज्य लेकिन केंद्र भी। चुनाव आयोग भी और माननीय मुझे कहना पड़ रहा है… ‘सुप्रीम कोर्ट’ भी। जब सुप्रीम कोर्ट को मालूम था कि हमारी जो पिटीशन है जो 4 बजे बाद इन्फक्चुअस (निष्प्रभावी) हो जाएगी तो सुना क्यों नहीं आज। कल की डेट क्यों लगाई है, ये सब मिली-जुली चोरी है।

जल्दबाजी में दिया बयान नहीं, सोची-समझी साजिश
पुष्यमित्र भार्गव ने सॉलिसिटर जनरल से इस मामले को बेहद गंभीरता से लेने और धारा 15 (1)(b) के तहत अवमानना की प्रक्रिया बढ़ाने की बात कही है। उन्होंने अपने पत्र में तीन बेहद महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु सामने रखे हैं।
- सोच-समझकर दिया गया बयान: भार्गव ने लिखा कि वीडियो को देखने से साफ पता चलता है कि दिग्विजय सिंह ने यह बात किसी जल्दबाजी में, अनजाने में या गुस्से में आकर नहीं कही है। बल्कि वे यह बयान देने से पहले बकायदा कुछ सेकंड के लिए रुके। जो यह दर्शाता है कि यह बयान पूरी तरह सोच-समझकर और सोची-समझी मंशा के तहत दिया गया है।
- अदालत की साख गिराने का प्रयास: पत्र के मुताबिक, देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था को “चोर” या “ईमानदार न होना” कहना केवल किसी फैसले की आलोचना नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका पर एक सीधा और सुनियोजित हमला है, जिससे जनता का अदालत पर से भरोसा उठ जाए।
- कानूनी धाराओं का उल्लंघन: मेयर ने दलील दी कि यह कृत्य साफ तौर पर कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट एक्ट, 1971 की धारा 2(c)(i) के तहत आता है, जो किसी भी अदालत की गरिमा और प्राधिकार को नीचा दिखाने या बदनाम करने की श्रेणी में आता है।
अगर इसे नहीं रोका तो हमले और बढ़ेंगे
पुष्यमित्र भार्गव ने अपने पत्र में लिखा- यह मुद्दा किसी राजनीतिक दल या विचारधारा से ऊपर का है। यह देश की सबसे बड़ी अदालत की स्वतंत्रता और सम्मान को बचाने की लड़ाई है। अगर ऐसे बयानों को बिना किसी कार्रवाई के छोड़ दिया गया, तो इससे अन्य लोगों के हौसले भी बुलंद होंगे और वे संवैधानिक संस्थाओं पर इस तरह के हमले शुरू कर देंगे। इसलिए इस मामले में त्वरित और सख्त कानूनी कदम उठाए जाने चाहिए।
आगे क्या होगा…
कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट एक्ट, 1971 की धारा 15 (1)(b) के नियमों के मुताबिक, किसी भी व्यक्ति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की याचिका दायर करने से पहले भारत के सॉलिसिटर जनरल या अटॉर्नी जनरल की लिखित सहमति अनिवार्य होती है। अब यदि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता इंदौर महापौर के इस पत्र पर अपनी सहमति दे देते हैं, तो दिग्विजय सिंह को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कोर्ट की अवमानना का नोटिस जारी हो सकता है।
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