मानसून की शुरुआती वर्षा ने शहर की हवा की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है। छोटी ग्वालटोली एयर क्वालिटी निगरानी स्टेशन के एक अप्रैल से एक जुलाई तक के आंकड़े …और पढ़ें

HighLights
- विशेषज्ञ बोले- राहत फिलहाल दो से तीन महीने की, मानसून बाद फिर बढ़ेगा प्रदूषण स्तर
- सबसे ज्यादा सुधार पीएम-2.5 और पीएम-10 जैसे प्रदूषकों में दर्ज हुआ है, जो सीधे श्वसन तंत्र और फेफड़ों को प्रभावित करते हैं
- शहरवासियों को राहत सिर्फ वर्षाकाल में दो से तीन महीने के लिए ही मिलेगी
प्रणय चौहान, नईदुनिया, इंदौर। अप्रैल व मई की झुलसा देने वाली गर्मी, तेज हवाओं और धूल भरे मौसम के बाद मानसून की शुरुआती वर्षा ने शहर की हवा की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है। छोटी ग्वालटोली एयर क्वालिटी निगरानी स्टेशन के एक अप्रैल से एक जुलाई तक के आंकड़े बताते हैं कि तीन महीनों में हवा में मौजूद धूल और सूक्ष्म कणों का स्तर लगातार घटा है।
सबसे ज्यादा सुधार पीएम-2.5 और पीएम-10 जैसे प्रदूषकों में दर्ज हुआ है, जो सीधे शहरवासियों के श्वसन तंत्र और फेफड़ों को प्रभावित करते हैं। शहरवासियों को राहत सिर्फ वर्षाकाल में दो से तीन महीने के लिए ही मिलेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि निर्माण गतिविधियों से उड़ने वाली धूल, सड़कों की सफाई, खुले में मलबा और वाहनों से निकलने वाले उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया, तो मानसून समाप्त होते ही प्रदूषण का स्तर फिर बढ़ जाएगा।
अप्रैल की तुलना में जून तक करीब 33 फीसद की कमी दर्ज की
आंकड़ों के अनुसार अप्रैल में पीएम-10 का औसत स्तर 122.28 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर था। मई में घटकर 111.57 और जून में 82.30 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रह गया। यानी अप्रैल की तुलना में जून तक करीब 33 फीसद की कमी दर्ज की। इसी तरह पीएम-2.5 का औसत अप्रैल में 42.49 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर था, जो मई में 28.62 और जून में 24.32 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर पर आ गया।
तीन महीनों में करीब 43 फीसद की गिरावट दर्ज की गई
तीन महीनों में करीब 43 फीसद की गिरावट दर्ज की गई। विशेषज्ञों के अनुसार वर्षा की बूंदें हवा में तैर रहे धूल के कणों और अन्य प्रदूषकों को जमीन पर जमाकर देती हैं। इसके कारण वातावरण में मौजूद पार्टिकुलेट मैटर का स्तर तेजी से कम हो जाता है और शहरवासियों को स्वच्छ हवा मिलती है। शहर में हुई करीब 63 मिमी वर्षा के बाद भी वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा है।
हालांकि राहत के बावजूद स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। कई दिनों में पीएम-10 और पीएम-2.5 का स्तर अब भी निर्धारित मानकों से ऊपर दर्ज किया गया। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि वर्षा प्रकृति का सबसे प्रभावी ‘एयर क्लीनर’ जरूर है, यह स्थायी समाधान नहीं है। शहर को पूरे वर्ष स्वच्छ हवा उपलब्ध कराने के लिए धूल नियंत्रण, हरित क्षेत्र बढ़ाने, सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहन देने और प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों पर लगातार निगरानी जरूरी होगी।
यह स्थिति रही
- 33 फीसद घटी पीएम-10 की मात्रा (अप्रैल से जून)
- 43 फीसद कम हुआ पीएम-2.5 का स्तर
- 122.28 एमजी/एम³ था अप्रैल में पीएम-10 का औसत
- 82.30 एमजी/एम³ रह गया जून में पीएम-10
- 42.49 एमजी/एम³ से घटकर 24.32 एमजी/एम³ हुआ पीएम-2.5
- 63 मिमी वर्षा के बाद दिखा वायु गुणवत्ता में सुधार
वर्षा कैसे करती है हवा साफ?
- वर्षा की बूंदें हवा में मौजूद धूल और सूक्ष्म कणों को जमीन पर बैठा देती हैं।
- तेज वर्षा के बाद पीएम-10 और पीएम-2.5 का स्तर तेजी से घटता है।
- नमी बढ़ने से धूल दोबारा उड़ने की संभावना भी कम हो जाती है।
- यह असर तब तक रहता है, जब तक मौसम शुष्क नहीं हो जाता।
क्या है चिंता?
- मानसून के बाद धूल और वाहन प्रदूषण फिर बढ़ सकता है।
- निर्माण स्थलों और खुले मलबे से प्रदूषण दोबारा बढ़ने की आशंका।
- केवल बारिश के भरोसे नहीं, बल्कि सालभर प्रदूषण नियंत्रण के उपाय जरूरी हैं।
वर्षा में प्राकृतिक रूप से कम
वर्षाकाल में प्राकृतिक रूप से प्रदूषण का स्तर कम हो जाता है। ठंड के मौसम में नमी ज्यादा होने से पार्टिकुलेट नीचे रह जाता है। इससे हवा भारी हो जाती है और ऊपर नहीं जा पाते हैं। इससे प्रदूषण का स्तर ज्यादा हो जाता है। -सतीश चौकसे, रीजनल आफिसर, मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास निरंतर जारी
प्रदूषण को नियंत्रण करने के प्रयास नगर निगम के अधिकारियों द्वारा निरंतर जारी है। केंद्र व राज्य सरकार ईवी को बढ़ावा दे रही है। निगम कुछ वाहनों को ईवी पर स्थानांतरित कर चुका है। कुछ को करना बाकी है। सड़क पर उड़ने वाली धूल को लगातार कम करते है। निर्माणाधीन भवनों को ग्रीन शोड से कवर करने के निर्देश दिए हैं। -क्षितिज सिंघल, आयुक्त नगर निगम
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