ईरान ने नेतन्याहू के इस एलान के बाद अमेरिका के साथ बातचीत बंद करने का किया फ़ैसला

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ऋतब्रत ( एकदम दाएं  )  और उनके बाद संदीपन

इमेज स्रोत, Sanjay Das

इमेज कैप्शन, पार्टी से निकाले गए टीएमसी विधायक ऋतब्रत ( एकदम दाएं) और उनके बाद विधायक संदीपन साहा

तृणमूल कांग्रेस ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में अपने दो विधायकों, ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निकाल दिया है.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने इसकी जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि इन दोनों विधायकों को ईमेल और व्हाट्सएप के जरिए इस फैसले की जानकारी दे दी गई है. साथ ही विधानसभा अध्यक्ष को भी इसकी सूचना दे दी गई है.

विधानसभा के जाली हस्ताक्षर कांड के सिलसिले में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सोमवार को सचिवालय में पत्रकारों को संबोधित किया.

इस दौरान उन्होंने बताया कि तृणमूल कांग्रेस के इन दोनों विधायकों ने ही विधानसभा अध्यक्ष से इस घटना के बारे में लिखित शिकायत की थी.

उसके बाद ही विधानसभा सचिवालय ने हेयर स्ट्रीट थाने में शिकायत दर्ज की.

मुख्यमंत्री शुभेंदु ने बताया कि यह शिकायत मिलने के बाद उन्होंने सीआईडी को इसकी जांच के आदेश दिए थे.

दरअसल, पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में शोभनदेव चट्टोपाध्याय के चयन के समर्थन वाले टीएमसी विधायकों के पत्र में कथित तौर पर कुछ विधायकों के हस्ताक्षर फर्जी होने का आरोप है.

कई विधायकों के हस्ताक्षर संदिग्ध होने और उपस्थित न होने के बावजूद पत्र में उनके नाम होने के कारण विधानसभा सचिवालय ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी.

इस मामले की जांच अब सीआईडी कर रही है. आरोप है कि कुछ विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर किए गए. वो लोग उस दिन विधानसभा में मौजूद भी नहीं थे.

मुख्यमंत्री शुभेंदु की प्रेस कॉन्फ़्रेंस खत्म होने के पंद्रह मिनट के भीतर ही तृणमूल ने हावड़ा में उलूबेड़िया पूर्व के विधायक ऋतब्रत बनर्जी और कोलकाता में एंटाली के विधायक संदीपन साहा को पार्टी से निकालने का फैसला किया.

पार्टी से निकाले जाने के बाद संदीपन ने पत्रकारों से कहा, “पार्टी अनैतिक काम करने वालों का समर्थन करती है. हमें तो पता ही नहीं था कि उपस्थिति रजिस्टर में हस्ताक्षर को प्रस्ताव पर हस्ताक्षर का रूप दे दिया जाएगा.”

ऋतब्रत बनर्जी को सीपीएम ने वर्ष 2014 में राज्यसभा में भेजा था. उनकी सदस्यता की मियाद 2020 तक थी. लेकिन 2017 में विभिन्न रूपों में उनको पार्टी से निकाल दिया गया था.

तीन साल तक वो पार्टीविहीन सांसद रहे. बाद में तृणमूल ने उनको पहले उपचुनाव में डेढ़ साल के लिए राज्यसभा भेजा था और फिर बीते महीने हुए चुनाव में उनको उम्मीदवार बनाया था.

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