क्या ट्रांसजेंडर संशोधन क़ानून ने ट्रांस पुरुषों को इसके दायरे से बाहर कर दिया?

क्या ट्रांसजेंडर संशोधन क़ानून ने ट्रांस पुरुषों को इसके दायरे से बाहर कर दिया?

समर एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय के अधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य के लिए काम करते हैं

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साल 2021 की बात है. समर शर्मा 18 साल के हो चुके थे जो हरियाणा के करनाल ज़िले के एक गांव के रहने वाले हैं. वे अपने घरवालों को समझाते-समझाते थक चुके थे कि वे अपने जन्म के समय दी गई लैंगिक पहचान के साथ अब नहीं जी सकते. उन्होंने घर छोड़ दिया.

समर एक ट्रांसजेंडर पुरुष हैं. अब वे दिल्ली में रहकर एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय के अधिकारों और मानसिक स्वास्थ्य के लिए काम करते हैं.

पिछले पाँच सालों में उन्होंने सबसे बड़ा सपना पूरा किया. उन्होंने सरकारी पहचान पत्रों पर अपना जेंडर ‘पुरुष’ दर्ज करवाया. यह उनके लिए क़ानूनी मान्यता, सम्मान और गरिमा के साथ जीने के लिए ज़रूरी था.

समर ने बीबीसी हिन्दी को बताया, “जब मुझे अपना पैन कार्ड मिला, जिसमें जेंडर के कॉलम में ‘पुरुष’ लिखा था तो मैं खुशी से रो पड़ा. मुझे ऐसा लगा जैसे कि मैंने कोई ट्रॉफ़ी जीती हो. वह कामयाबी हासिल की हो जो मैं हमेशा चाहता था.”

समर के लिए सरकारी पहचान पत्रों में उनकी ख़ुद की पहचान (सेल्फ आइडेंटिटी) का सही तरह से दर्ज होना ही उनके लिए असली मान्यता और वैधता की निशानी है.

उनके आधार कार्ड और अन्य पहचान पत्रों में भी उन्हें पुरुष के तौर पर मान्यता मिली हुई है. उनके पास सरकार की तरफ़ से दिए जाने वाले ट्रांसजेंडर व्यक्ति कार्ड के साथ-साथ जेंडर संगति सर्जरी (जेंडर अफ़र्म‍िंग सर्जरी) के लिए ज़रूरी जेंडर आइडेंटिटी डिस्फ़ोरिया (जीआईडी) प्रमाण पत्र भी है.

जीआईडी प्रमाण पत्र एक चिकित्सकीय दस्तावेज़ होता है. इसमें विशेषज्ञ यह दर्ज करते हैं कि व्यक्ति अपनी वास्तविक जेंडर पहचान और जन्म के समय निर्धारित जेंडर के बीच असंगति की वजह से मानसिक तौर पर असहज महसूस कर रहा है.

ये सब दस्तावेज़ इकट्ठे करने में समर को छह साल लगे. इस दौरान उन्होंने एक लंबी लड़ाई लड़ी. अक्सर कोर्ट-कचहरी के चक्कर भी लगाने पड़े.

ट्रांसजेंडर विधेयक में संशोधन

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर से आए 19 साल के ट्रांसजेंडर पुरुष अव्यांश द्विवेदी जेंडर संगति सर्जरी के लिए आए हैं लेकिन बिल ने उनकी योजना पर पानी फेर दिया है.

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ट्रांसजेंडर व्यक्ति संशोधन बिल दक्षता विकास और उद्यमशीलता मंत्री डॉक्टर वीरेंद्र कुमार ने 13 मार्च को लोकसभा में पेश किया. यह बिल लोकसभा में 24 और राज्यसभा में 25 मार्च को पास हुआ. 30 मार्च को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस बिल पर हस्ताक्षर कर दिए. इसके बाद यह लागू हो गया है.

वरिष्ठ अधिवक्ता जयना कोठारी बिल की बारीकियों को समझाते हुए कहती हैं, “इस विधेयक ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा को केवल सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले लोगों तक सीमित कर दिया है. जैसे, किन्नर, हिजड़ा, अरावनी, जोगता और इंटरसेक्स विविधताओं वाले व्यक्ति ही ट्रांसजेंडर व्यक्ति माने जाएंगे.”

“इस संशोधन से पहले क़ानून में ट्रांसजेंडर पुरुष भी शामिल थे. अब यह समुदाय बाहर हो गया है. इस वजह से ट्रांस पुरुष (ट्रांसमेन) और ‘ट्रांसमैस्कुलिन’ पहचान को पूरी तरह ख़त्म कर दिया गया है.”

जेंडर संगति सर्जरी और ट्रांसजेंडर पुरुषों की परेशानी

समर ने इस साल जेंडर संगति सर्जरी कराने का फ़ैसला किया था ताकि वे अपने आपको पुरुष स्वरूप के और क़रीब महसूस कर सकें.

जैसे ही मौजूदा बिल पेश हुआ, समर ने सूरत के उस क्लिनिक में फ़ोन किया, जहां उन्होंने दिसंबर 2024 में हिस्टेरेक्टॉमी यानी गर्भाशय निकालने की सर्जरी करवाई थी. उन्हें अभी कुछ और सर्जरी करवानी हैं.

वह बताते हैं, “मुझे डर लगा कि नए विधेयक से मेरी पहचान पर असर पड़ सकता है. मैंने जल्दी से सर्जरी करवाने का फ़ैसला किया. जब मैंने डॉक्टर को फ़ोन किया तो उन्होंने मुझसे मेडिकल सर्टिफ़िकेट मांगा. उन्होंने कहा कि सर्जरी हो जाने के बाद उन्हें मेरी सारी जानकारी के साथ ज़िला मजिस्ट्रेट को सूचित करना होगा.”

नए बिल में मेडिकल बोर्ड का सर्टिफ़िकेट ज़रूरी बना दिया गया है. समर कहते हैं कि पहले के क़ानून के तहत ‘सेल्फ आइडेंटिटी’ की मान्यता थी. इसमें मेडिकल जांच की ज़रूरत नहीं थी. केवल जीआईडी प्रमाण पत्र और ट्रांसजेंडर व्यक्ति कार्ड दिखा कर कोई भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति, जेंडर संगति सर्जरी करवा सकता था.

दरअसल, बिल में ट्रांस पुरुषों के बारे में चुप्पी क़ानूनी मान्यता तक सीमित नहीं है. यह उन्हें जेंडर संगति सर्जरी के लिए चिकित्सा सहायता प्राप्त करने से भी रोकता है.

एडवोकेट जयना कोठारी बताती हैं, “इसके लिए संशोधन बिल में एक मेडिकल बोर्ड निर्धारित करने की बात की गई है. क़ानून में दी गई ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की परिभाषा के अनुसार बोर्ड इंसान की ट्रांस स्थिति तय करेगा.”

“इसके अलावा, बिल यह भी अनिवार्य करता है कि इलाज देने वाली मेडिकल संस्था ट्रांस व्यक्तियों की सभी संबंधित जानकारी ज़िला मजिस्ट्रेट को दे. इस प्रावधान ने ट्रांसजेंडर पुरुष समुदाय में भारी डर पैदा कर दिया है.”

‘मेरी आत्मा एक पुरुष की है’

सरकारी पहचान पत्रों पर अपना जेंडर 'पुरुष' दर्ज करवाना समर के लिए सपना पूरा होना था

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समर रुआंसे हो कर कहते हैं, “अगर मैं मेडिकल बोर्ड के पास जाता हूं, तो वो मेरी पहचान को नकार देंगे क्योंकि चिकित्सकीय रूप से मेरे शरीर में सभी स्त्री अंग अब भी मौजूद हैं.”

समर सवाल करते हैं, “क्या कोई मेडिकल बोर्ड मेरी उस आत्मा का परीक्षण कर सकता है, जो एक पुरुष की है? जब मेडिकल बोर्ड के सामने कपड़े उतारने की बात आती है तो मेरा ‘बॉडी डिस्मॉर्फ़‍िया’ और बढ़ जाता है. ऐसे में मैं यह क्यों करूं?”

‘बॉडी डिस्मॉर्फ़‍िया’ एक मानसिक स्थिति है. इसमें व्यक्ति को अपने शरीर से असहजता महसूस होती है. ट्रांस व्यक्तियों को अक्सर इस मानसिक स्थिति से जूझना पड़ता है.

हम दिल्ली के एनजीओ ‘ट्वीट फाउंडेशन’ द्वारा संचालित शेल्टर होम ‘आसरा’ भी गए. यह ट्रांस पुरुषों को आश्रय और सहायता प्रदान करता है.

उत्तर प्रदेश के हमीरपुर से आए 19 साल के ट्रांसजेंडर पुरुष अव्यांश द्विवेदी वहां रह रहे हैं. उन्होंने हमें बताया कि वे दिल्ली ख़ासतौर पर जेंडर संगति सर्जरी के लिए आए हैं लेकिन बिल ने उनकी योजना पर पानी फेर दिया है.

अव्यांश का दावा है कि जिस मेडिकल संस्था से उन्होंने संपर्क किया, उसने सभी ट्रांस पुरुषों के लिए सर्जरी फिलहाल रोक दी है.

समर की भावना को दोहराते हुए अव्यांश कहते हैं, “मैंने अपने गांव में बेहद प्रताड़ना सही है. वहां हर क़दम पर मेरी पहचान को सवालों के घेरे में रखा और नकारा गया. मुझे लगा था कि सर्जरी के बाद मेरे गांव और कॉलेज में लोगों के पास मेरे जेंडर को लेकर कुछ कहने का मौका नहीं रहेगा. मैं अपनी सेल्फ आइडेंटिटी के जेंडर में शांति से जी पाऊंगा.”

आसरा के प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर, ट्रांसजेंडर पुरुष मनवीर यादव भी इस बात को सिरे से नकारते हैं कि कोई मेडिकल बोर्ड उनका जेंडर तय करे. वह ट्रांसजेंडर पुरुषों के ख़िलाफ़ चिकित्सा संस्थानों में हो रहे सामाजिक भेदभाव की बात करते हैं.

मनवीर कहते हैं कि जेंडर संगति सर्जरी होने के बाद जब भी वे किसी गाइनकोलॉजिस्ट के पास गए तो उन्हें अपने जेंडर और यौनिकता को लेकर कई अनचाहे सवालों का सामना करना पड़ा है.

मनवीर कहते हैं, “संशोधन कुछ इस तरह से बनाया गया है कि डॉक्टर हमें चिकित्सा सुविधाएं देने से मना कर सकते हैं क्योंकि अब तो ट्रांसजेंडर पुरुष इसकी परिभाषा में शामिल नहीं हैं. जब पहले हमें ऐसा भेदभाव झेलना पड़ता था तो हम जानते थे कि हम डॉक्टरों को क़ानूनी रूप से चुनौती दे सकते हैं लेकिन अब तो यह भी बदल गया है.”

डॉक्टरों की दुविधा

नया बिल पास होने के बाद से डॉक्टरों के बीच भी काफ़ी डर है. इसीलिए वे अभी सर्जरी नहीं कर रहे

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इमेज कैप्शन, नया बिल पास होने के बाद से डॉक्टरों के बीच भी काफ़ी डर है. इसीलिए वे अभी सर्जरी नहीं कर रहे. (सांकेतिक तस्वीर)

बीबीसी हिंदी ने सूरत के एलीगेंस क्लिनिक के डॉक्टर आशुतोष शाह से संपर्क किया. समर इनके पास ही सर्जरी के लिए गए थे.

डॉक्टर आशुतोष ने बताया कि डॉक्टरों के बीच भी काफ़ी डर है. इसीलिए वे अभी सर्जरी नहीं कर रहे. उन्होंने कहा, “यह बिल दक्षता विकास एवं उद्यमशीलता मंत्रालय ने पेश किया है लेकिन डॉक्टरों को स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय और राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग से दिशा-निर्देश मिलते हैं. इन्होंने अभी तक कुछ भी साफ़ नहीं किया है. इससे डॉक्टरों में भारी डर और भ्रम की स्थिति बन गई है और जेंडर संगित सर्जरी पूरी तरह रुक गई है.”

साल 2019 में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम पास होने के बाद जेंडर संगति सर्जरी के लिए एक मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिक से जीआईडी प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती थी.

अब संशोधन बिल पास होने के बाद यह प्रक्रिया विवादास्पद हो गई है. अब एक मेडिकल बोर्ड तय करेगा कि कोई ‘चिकित्सकीय’ और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से ट्रांसजेंडर व्यक्ति है या नहीं.

‘संदेहपूर्ण स्थिति है’

इस बीच, मनवीर और ट्रांसजेंडर पुरुष कार्यकर्ता विश्वनाथ मैथिल ने मिल कर ट्रांसजेंडर पुरुषों की पहचान और अधिकारों के लिए इस बिल को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दर्ज की है.

चार मई को सुप्रीम कोर्ट ने इस बिल को चुनौती देने वाली सारी याचिकाओं पर सुनवाई की. मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली बेंच ने केंद्र, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को छह हफ़्ते में जवाब दाख़िल करने के लिए नोटिस जारी किया है.

मनवीर सिंह कहते हैं कि संशोधन के बाद डॉक्टर चिकित्सा सुविधाएं देने से मना कर सकते हैं क्योंकि अब ट्रांसजेंडर पुरुष इस बिल की परिभाषा में शामिल नहीं हैं.

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सुनवाई के दौरान मनवीर की ओर से पेश हुईं वकील श्रद्धा देशमुख ने ट्रांस पुरुषों के इलाज में अचानक आई रुकावट को रेखांकित किया. उन्होंने दावा किया कि जो लोग इस समय हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी ले रहे हैं, उन्हें भी इलाज देने से मना किया जा रहा है.

समर देश के उन युवा ट्रांसजेंडर पुरुषों के भविष्य पर दुख जताते हैं जो सामाजिक दबावों के चलते अपनी पहचान छुपाए बैठे हैं. समर कहते हैं, “जब इस इंटरव्यू की शुरुआत में मैं मेडिकल बोर्ड द्वारा ट्रांसजेंडर पुरुष की पहचान के भविष्य का फैसला लिए जाने की बात करते हुए रोया था, तो मैं ख़ुद के लिए नहीं रोया था.”

“मैं वो सफ़र तय कर चुका हूं जहाँ मुझे अपनी सेल्फ आइडेंटिटी में सरकारी पहचान पत्र मिले. मुझे पता है कि मैं अपने शरीर के लिए और आगे भी लड़ सकता हूँ लेकिन इन संशोधनों ने उन युवा ट्रांसजेंडर पुरुषों के लिए सब कुछ बहुत मुश्किल बना दिया है जो सेल्फ आइडेंटिटी पाने की कोशिश के बारे में सोचकर भी सिहर जाएंगे क्योंकि इस बिल ने हमें मिटाने का संकल्प ले लिया है.”

लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि जिन ट्रांसजेंडर पुरुषों ने अपनी सेल्फ आइडेंटिटी में सरकारी दस्तावेज़ हासिल किया है, उनका क्या होगा?

अधिवक्ता जयना भी यह सवाल करती हैं और कहती हैं, “यह संदेहपूर्ण स्थिति है. ख़ासतौर पर उन ट्रांसजेंडर पुरुषों के लिए जिन्होंने सरकारी दस्तावेज़ों में ‘सेल्फ आइडेंटिटी’ दर्ज करवाने के लिए एक कठिन लड़ाई लड़ी है. लेकिन इस विधेयक ने उन पर भी सवाल खड़ा कर दिया है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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