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अमेरिका ने कहा है कि उसने होर्मुज़ स्ट्रेट में तीन तेल टैंकरों पर हुए हमलों के जवाब में ईरान पर ज़बरदस्त हवाई हमले किए हैं.
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (सेंटकॉम) ने मंगलवार देर रात बताया कि उसने 80 से ज्यादा ठिकानों को निशाना बनाया. इनमें ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) की 60 से ज़्यादा नेवी यूनिट्स भी शामिल थीं.
ईरान के सरकारी मीडिया के अनुसार, ये हमले क़ेशम द्वीप, बंदर अब्बास और सीरिक में हुए, जिनमें छर्रे लगने से कुछ लोग घायल हो गए.
बुधवार तड़के आईआरजीसी ने दावा किया कि उसने जवाबी कार्रवाई करते हुए बहरीन और कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए हैं. पिछले महीने ईरान और अमेरिका के बीच एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर दस्तख़त हुए थे. इसका उद्देश्य युद्धविराम को आगे बढ़ाना और हर मोर्चे पर संघर्ष खत्म करना था. अब सवाल उठ रहा है कि इस समझौते में क्या-क्या शामिल था?
उधर, तुर्की में आयोजित एक शिखर सम्मेलन में नेटो प्रमुख मार्क रुटे ने कहा कि अमेरिका के ये हमले “पूरी तरह ज़रूरी” थे. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ईरान ने अमेरिका के साथ हुए समझौते का उल्लंघन किया है.
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ये घटनाक्रम तब हो रहा है जब ईरान में उनके सर्वोच्च नेता रहे आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में चल रही हैं. ईरान ने दावा किया है कि इसमें देश के अलग-अलग हिस्सों और दुनिया भर से आए क़रीब डेढ़ करोड़ लोगों ने हिस्सा लिया.
तब से कई विशेषज्ञ इस बात पर भी चर्चा कर रहे हैं कि क्या ख़ामेनेई के जनाज़े में उमड़ी भीड़ दुनिया को दिखाकर ईरान अमेरिका और पश्चिमी जगत को कोई संदेश देना चाहता है?
क्या भीड़ के ज़रिए ईरान दुनिया को अपने को मिल रहा समर्थन दिखाना चाहता है और इसके ज़रिए अमेरिका के साथ डील में अपना पक्ष मज़बूत करना चाहता है. क्या ईरान दिखाना चाहता है कि चार महीनों तक अमेरिकी और इसराइली हमले झेलने के बाद भी उसकी ताक़त कम नहीं हुई है?
क्या वो ये दिखाना चाहता है कि ख़ामेनेई की मौत का बदला लेने के लिए ईरानी जनता कितनी आतुर है? पढ़िए, बीबीसी की प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संवाददाता लीस डूसेट का विश्लेषण
तेहरान से लीस डूसेट का विश्लेषण
ईरान की राजधानी तेहरान में मारे गए सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के लिए तीन दिन का सार्वजनिक शोक सोमवार को ख़त्म हुआ. इस मौके को नई सत्ता संभाल रहे नेताओं ने दुनिया के सामने अपनी ताक़त और राजनीतिक संदेश दिखाने के बड़े आयोजन में बदल दिया.
आयतुल्लाह ख़ामेनेई और उनके परिवार के चार अन्य सदस्यों के ताबूतों को लेकर निकला अंतिम यात्रा का विशाल जुलूस लगभग 10 किलोमीटर लंबे रास्ते से गुज़रा.
शोक मनाने वाले लाखों लोगों की भारी भीड़ की वजह से जुलूस कई बार धीमा पड़ा और कई जगह रुक भी गया. इसे हाल के वर्षों की सबसे बड़ी सार्वजनिक सभाओं में से एक माना जा रहा है.
एक हफ़्ते तक चले अंतिम संस्कार कार्यक्रमों में सोमवार का जुलूस सबसे अहम रहा. पूरे आयोजन की बारीकी से तैयारी की गई थी और इसके ज़रिए प्रतिरोध और बदले का राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की गई.
हालांकि, बड़ी संख्या में लोग इस कार्यक्रम से दूर भी रहे. पिछले एक साल से भी कम समय में दो युद्ध, लगभग 80 फ़ीसदी महंगाई और जनवरी में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के बाद हुए दर्द और तनाव की वजह से कई लोग शामिल नहीं हुए.
कुछ लोगों का मानना है कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई के लिए ख़ामेनेई भी ज़िम्मेदार थे, क्योंकि वह देश के सर्वोच्च नेता होने के साथ-साथ सेना के प्रमुख भी थे. उस कार्रवाई में हज़ारों लोगों की मौत हुई थी.
शहर में जगह-जगह लगाए गए ‘मौक़िब’ (मुफ़्त खाना और पानी देने वाले विश्राम केंद्र) के बाहर एक व्यक्ति ने कहा, “मैं अंतिम यात्रा में बिल्कुल नहीं जा रहा. बहुत से लोगों के पास काम नहीं है और वे बेहद दुखी हैं.”
उसने कहा, “लोगों की ज़िंदगी मुश्किलों से भरी हुई है.”
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अमेरिका और इसराइल विरोधी नारे
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सोमवार के जुलूस की हवाई तस्वीरों में तेहरान की एक प्रमुख सड़क पूरी तरह लोगों से भरी दिखाई दी. बड़ी संख्या में मौजूद समर्थक गहरे शोक में डूबे थे और ‘अमेरिका मुर्दाबाद’ और ‘इसराइल मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगा रहे थे.
“आंसू इंसान के दिल में उठने वाले दर्द और ग़म से निकलते हैं, और पूरी दुनिया इस सच्चाई को देख रही है.’ ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने यह बात कहते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे का जवाब दिया, जिसमें उन्होंने इन आंसुओं को ‘नकली आंसू’ बताया था.
मंगलवार को ये कार्यक्रम तेहरान के दक्षिण में स्थित क़ोम में हुए. इसके बाद अब पड़ोसी देश इराक़ के नजफ़ और कर्बला में श्रद्धांजलि दी जाएगी.
आख़िरी रस्म-ए-दफ़्न गुरुवार को मशहद स्थित इमाम रज़ा दरगाह में होगी. यह आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई का जन्मस्थान भी है और ईरान का सबसे पवित्र शहर माना जाता है.
तेहरान विश्वविद्यालय के शोधकर्ता मोहम्मद इस्लामी का कहना है, “अंतिम संस्कार के इन आयोजनों का मक़सद ख़ामेनेई को सिर्फ़ एक राष्ट्रीय नेता के तौर पर नहीं, बल्कि ऐसे धार्मिक और राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में पेश करना है, जिनका प्रभाव पूरे मुस्लिम जगत, ख़ासकर शिया समुदाय तक फैला हुआ था.”
हालांकि, कुछ लोग उनकी विरासत को अलग नज़रिए से देखते हैं. ‘रीडिंग ख़ामेनेई: द वर्ल्ड व्यू ऑफ़ ईरान्स मोस्ट पावरफुल लीडर’ के लेखक करीम सज्जादपुर कहते हैं, “जिस क्रांति को उन्होंने बचाए रखा, वह ऐसी दुनिया के लिए थी, जो अब है ही नहीं.”
तेहरान में एक खुले ट्रक को बेहद ख़ूबसूरत जालीदार सजावट और अरबी में लिखी इस्लामी इबारतों से सजाया गया था. इस ट्रक पर ईरान के राष्ट्रीय ध्वज के हरे, सफ़ेद और लाल रंग में रंगे पांच ताबूत रखे गए थे. इनमें सबसे छोटा ताबूत आयतुल्ला अली ख़ामेनेई की 14 महीने की पोती ज़ारा का था.
इन सभी की मौत 28 फ़रवरी को युद्ध शुरू होने के शुरुआती घंटों में इसराइल और अमेरिका के हवाई हमलों में हुई थी.
लाल रंग के ज़रिए ट्रंप को संदेश
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अंतिम यात्रा में उमड़ी भारी भीड़ में काले कपड़े पहने शोकाकुल लोगों के बीच लाल रंग सबसे ज़्यादा दिखाई दे रहा था.
ख़ून और शहादत का प्रतीक माने जाने वाले धार्मिक झंडों के ज़रिए सर्वोच्च नेता की हत्या का बदला लेने की मांग को और ज़ोर दिया गया.
सैकड़ों विदेशी पत्रकारों को इस अंतिम संस्कार की कवरेज के लिए अनुमति दी गई थी, जैसा कि ईरान में अमूमन होता नहीं है. उनके सामने अंग्रेज़ी में लिखे ऐसे पोस्टर भी लहराए गए, जिनमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मुख्य निशाना बताया गया था.

ईरान के एक मैसेजिंग ऐप पर सरकार समर्थकों को सलाह दी गई थी कि वे “हमारा बदला तय है.” और “उन्हें इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी.” जैसे नारे लगाएं.
मोजतबा नाम के एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने हमारे पास आकर कहा कि उनके पास एक संदेश है.
उन्होंने कहा, “मैं राष्ट्रपति ट्रंप और पूरी दुनिया से एक बात कहना चाहता हूं. बहुत जल्द, बहुत जल्द आप व्हाइट हाउस के ऊपर बदले के निशान देखेंगे. और जल्द ही व्हाइट हाउस का रंग मेरे लाल झंडे जैसा होगा.”
सरकार के एक अधिकारी ने मुझे बताया, “इनमें से कुछ बातें सिर्फ़ रस्म निभाने के लिए कही जाती हैं. लेकिन व्यवस्था के भीतर मौजूद कट्टरपंथी धड़े में ग़ुस्सा सचमुच है. ये लोग अमेरिका के साथ हुए नए समझौते का विरोध करते हैं और मानते हैं कि उसी की वजह से हमारे नेता की हत्या हुई.”
कुछ अलग आवाज़ें भी शामिल
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भीषण आर्थिक संकट से जूझ रहे ईरान के नए नेताओं के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था को संभालने की है. कई हफ़्तों तक चले युद्ध के बाद अगर वे प्रतिबंधों में राहत और विदेशों में फंसी ईरानी संपत्तियों को वापस पाना चाहते हैं, तो उन्हें अमेरिका के साथ बातचीत जारी रखनी होगी.
सरकार समर्थकों की भीड़ में मौजूद लोग लगातार विदेशी मेहमानों से, जिनमें सरकार के मुताबिक़ 400 सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर भी शामिल थे, पूछ रहे थे, “आप किस देश से हैं?” वे विदेशी पत्रकारों और मीडिया प्रतिनिधियों से बार-बार कहते थे, “सच दिखाइए.”
हालांकि, इस भीड़ में कुछ अलग आवाज़ें भी थीं. काले चोगे में मौजूद दो युवा ईरानी महिलाओं ने हमें अलग ले जाकर धीरे से कहा कि “असल क्रांति की आवाज़” कुछ महीने पहले इन्हीं सड़कों पर हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों में सुनाई दी थी.
ईरान अब 1979 की इस्लामी क्रांति की पहली पीढ़ी के आख़िरी संस्थापक नेता को दफ़नाने के साथ एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है. लेकिन आगे का रास्ता अब भी अनिश्चित बना हुआ है.
करीब चार दशक पहले मैं भी ईरान में मौजूद थी, जब पहले सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी का अंतिम संस्कार हुआ था. उस दौरान मची भगदड़ में उनका लकड़ी का ताबूत टूट गया था और सफ़ेद कफ़न में लिपटा उनका शव भीड़ के बीच गिर गया था.
नए दौर में प्रवेश करता देश
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अब ईरान अपने तीसरे सर्वोच्च नेता, 56 वर्षीय मोजतबा ख़ामेनेई, के नेतृत्व में एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है. हालांकि, अपने पिता की मौत वाले हवाई हमलों में गंभीर रूप से घायल होने के बाद से वह अब तक सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए हैं.
तेहरान के ग्रैंड मुसल्ला परिसर में, जहां उनके पिता का पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था, उनके तीन भाई तो मौजूद थे, लेकिन मोजतबा की ग़ैरमौजूदगी सबसे ज़्यादा चर्चा का विषय बनी रही.
ईरानी अधिकारियों का कहना है कि इसराइल अब भी मोजतबा ख़ामेनेई की हत्या की धमकियां दे रहा है.
हमदान से अपने परिवार के साथ करीब चार घंटे का सफ़र तय कर अंतिम यात्रा में शामिल होने आई एक महिला ने कहा, “वह मेरे दिल में हैं और मैं दुआ करती हूं कि वह ट्रंप और नेतन्याहू से सुरक्षित रहें.”
लेकिन आयोजकों ने जिस कार्यक्रम को “सदी का सबसे बड़ा आयोजन” बताया है, उसमें दूसरे प्रतीकों को भी प्रमुखता देने की कोशिश की गई.
इनमें सबसे प्रमुख इंक़लाब (क्रांति) चौक पर लगाया गया एक विशालकाय बंद मुट्ठी का बुत है. इसे “प्रतिरोध की मुट्ठी” का प्रतीक बताया जा रहा है. इसका मक़सद ईरान के भीतर और बाहर मौजूद विरोधियों को यह संदेश देना है कि इस्लामिक गणराज्य को हराया नहीं जा सकता.
बीबीसी की मुख्य अंतरराष्ट्रीय संवाददाता लीस डूसेट तेहरान से रिपोर्टिंग कर रही हैं. हालांकि, यह शर्त रखी गई है कि उनकी कोई भी रिपोर्ट बीबीसी पर्शियन सर्विस पर प्रसारित या इस्तेमाल नहीं की जाएगी.
ईरान में काम कर रहे सभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों पर इस तरह की पाबंदियां लागू हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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