ट्रंप और पुतिन, दोनों को ही चीन की ज़रूरत क्यों है?

ट्रंप और पुतिन, दोनों को ही चीन की ज़रूरत क्यों है?

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 19 और 20 मई को चीन के दौरे पर थे

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खुश दिखते बच्चे, गार्ड ऑफ़ ऑनर, तोपों की सलामी और मार्चिंग बैंड

‘ग्रेट हॉल ऑफ़ द पीपल’ के बाहर व्लादिमीर पुतिन का स्वागत ठीक वैसा था जैसा पिछले हफ़्ते डोनाल्ड ट्रंप का हुआ था.

सिर्फ़ कुछ ही दिनों के अंतर पर दो बेहद अहम देशों के राष्ट्रपति का दौरा करना- यह ठीक वही छवि है जो शी जिनपिंग दुनिया को दिखाना चाहते हैं: सबसे बातचीत करना, किसी एक से बंधे न होना.

चीन के लिए ये दौरे इस बात का प्रमाण हैं कि उसकी विशाल अर्थव्यवस्था और हाल ही में हासिल कूटनीतिक ताकत के कारण अब सभी रास्ते बीजिंग की ओर जाते हैं.

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किंग्स कॉलेज लंदन के समीर पुरी कहते हैं, “विश्व मामलों का नया दौर पश्चिम के इर्द-गिर्द कम केंद्रित है.”

“वैश्विक मंच पर चीन के पास छिपी हुई शक्ति काफ़ी है, जरूरी नहीं कि वह इसे सीधे तौर पर संघर्षों को सुलझाने में इस्तेमाल करे, बल्कि चीन की शैली यह है कि वह अपनी हैसियत का इस्तेमाल धीरे-धीरे करना चाहता है.”

‘रूस को चीन की ज़रूरत पहले से ज़्यादा है’

व्लादिमीर पुतिन और शी जिनपिंग

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इमेज कैप्शन, चीन के साथ रूसी गैस पाइपलाइन को मंज़ूरी नहीं मिली

दृश्य काफ़ी हद तक एक जैसा था-स्पॉटलाइट के केंद्र में आत्मविश्वास के साथ मेज़बानी करते हुए शी. लेकिन दोनों दौरों को संचालित करने वाली राजनीति बहुत अलग थी.

20 से ज़्यादा बार चीन जा चुके पुतिन के शी के साथ करीबी व्यक्तिगत संबंध लगते हैं. यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों ने उन्हें चीन पर काफ़ी निर्भर भी कर दिया है, जो अब रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और तेल और गैस का सबसे बड़ा ग्राहक भी है.

काफ़ी समय से यह एक असंतुलित साझेदारी रही है, और आज यह और भी स्पष्ट हो गई. बातचीत का अंत व्यापार और तकनीक पर 20 से अधिक समझौतों के साथ हुआ, लेकिन उस रुकी हुई रूसी गैस पाइपलाइन को अभी मंज़ूरी नहीं मिली, जिसे पुतिन वर्षों से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. एक लंबे संयुक्त बयान में भी कुछ ख़ास नहीं निकला.

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वीडियो कैप्शन, ट्रंप-जिनपिंग के बीच हुई इस बैठक की क्यों हो रही आलोचना?

शंघाई स्थित ईस्ट चाइना नॉर्मल यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर रूसी स्टडीज़ के डॉक्टर झेंग रुनयू कहते हैं, “चीन और रूस दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत है, लेकिन साफ़ है कि वैश्विक मंच पर रूस को चीन की ज़रूरत पहले से ज़्यादा है.”

“आज के अंतरराष्ट्रीय माहौल को देखते हुए, अपनी कई वर्तमान चुनौतियों से निपटने के लिए चीन के साथ गहरा सहयोग रूस के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.”

अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ बातचीत करते हुए भी चीनी नेता का पलड़ा भारी दिखाई दिया. दुनिया के बाकी हिस्सों के साथ मज़बूत व्यापारिक संबंधों और दुर्लभ खनिजों तथा उन्नत विनिर्माण में चीन की पकड़ ने उन्हें बढ़त दी है. ट्रंप की अस्थिरता के कारण चीन खुद को वॉशिंगटन के मुकाबले बराबरी के स्तर पर पाता है.

और ट्रंप और पुतिन दोनों के साथ बातचीत में, शी ऐसे नेताओं के सामने थे जो महंगे युद्धों में उलझे हुए थे, जो उनकी अपेक्षा से अधिक लंबे खिंच गए हैं. ट्रंप के मामले में- मध्य पूर्व का युद्ध एक वैश्विक संकट में बदल गया है, जिसने उनके देश में उनकी लोकप्रियता को गिरा दिया है. पुतिन के लिए- यूक्रेन पर आक्रमण का का पांचवां साल चल रहा है.

इसने रूस को अलग-थलग कर दिया है और उसके अपने लोगों को भी मुश्किलों में डाला है.

दोनों ही मामलों में यह भी साफ़ महसूस हुआ कि अब वैश्विक मंच पर कैसे और किन शर्तों पर संबंध रखने हैं, इसका स्वर और शर्तें तय करने की शक्ति चीन के पास है.

शी का ‘चीनी सपना’

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वीडियो कैप्शन, अमेरिका से रिश्तों पर क्या बोले जिनपिंग

यह उस देश के लिए एक उल्लेखनीय बदलाव है, जो सिर्फ़ पांच साल पहले कूटनीतिक अलगाव के कगार पर दिखाई दे रहा था.

उसकी सीमाएं एक महामारी के कारण बंद थीं, जिसे तब ट्रंप ने (जिनका बतौर अमेरिकी राष्ट्रपति पहला कार्यकाल था) ‘चीनी वायरस’ कहा था. तथाकथित ‘वुल्फ़ वॉरियर’ कूटनीति, जिसमें चीनी राजनयिकों और सरकारी मीडिया ने पश्चिमी आलोचकों को शांत करने के लिए आक्रामक भाषा का इस्तेमाल किया. इसके उभार के बीच पश्चिम के साथ उसके संबंध तेज़ी से बिगड़े थे.

अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ बातचीत करते हुए भी चीनी नेता का पलड़ा भारी दिखाई दिया था

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इमेज कैप्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ बातचीत करते हुए भी चीनी नेता का पलड़ा भारी दिखाई दिया था

शिनजियांग में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों और हांगकांग पर चीन के बढ़ते नियंत्रण को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना भी बढ़ी थी, और पश्चिमी सरकारों ने चीनी वस्तुओं पर प्रतिबंध और निर्यात नियंत्रण लगाए थे. चीन ने इसका जवाब बदले में प्रतिबंध लगाकर दिया था.

और पांच साल बाद, चीन ने खुद को वैश्विक कूटनीति और व्यापार के एक अनिवार्य केंद्र के रूप में फिर से स्थापित कर लिया है.

एक ऐसी समस्या, जिसे नियंत्रित किया जाना है, के रूप में देखे जाने के बजाय चीन एक ऐसी शक्ति बन गया है जिसके साथ संबंध रखने ज़रूरी हैं.

चीन अपनी कूटनीतिक शैली में नरमी लाया है, संभवतः उसे कुछ असहज वास्तविकताओं का एहसास हो गया था. उसकी आर्थिक सुस्ती का मतलब है कि उसे ज़्यादा विदेशी निवेश और व्यापार की ज़रूरत है, जिसके लिए स्थिर संबंध आवश्यक हैं. उसका बहुत ज़्यादा टकराव वाला रवैया क्षेत्र के महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों, जैसे दक्षिण कोरिया, फिलीपींस और वियतनाम को अमेरिका के करीब कर रहा था.

लेकिन समय भी यहां अहम है. जब से अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने हैं, तब से चीन ने ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और ब्रिटेन- जो अमेरिका के प्रमुख सहयोगी हैं- के साथ संबंध सुधार लिए हैं. कनाडा, ब्रिटेन और जर्मनी सहित दुनिया के कई नेता वैश्विक स्तर पर दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के साथ समझौते करने के लिए चीन के लाल कालीन पर चलकर आए हैं.

पिछले एक दशक से शी अपने लोगों से यह वादा करते रहे हैं कि वह ‘चीनी राष्ट्र के महान पुनरुत्थान’ की दिशा में काम करेंगे. और यह पिछला हफ़्ता घरेलू प्रचार का एक अविश्वसनीय उदाहरण रहा है: चीनी नेता ऐसे व्यक्ति की तरह दिखे जिससे हर कोई मिलना चाहता है.

लेकिन यह दौरा चीन की कूटनीतिक शक्ति की सीमाओं को भी उजागर करता है.

नाज़ुक कूटनीतिक संतुलन साधना

शी ने केवल एक युद्ध का उल्लेख किया- और वह मध्य पूर्व का संघर्ष था.

उन्होंने पुतिन से कहा कि ईरान में युद्ध का पूर्ण अंत ‘अत्यंत आवश्यक’ है, जबकि रूस के यूक्रेन पर आक्रमण का कोई उल्लेख नहीं किया.

शी और पुतिन दोनों ने “अन्य देशों के ख़िलाफ़ विश्वासघाती सैन्य हमलों, ऐसे हमलों की तैयारी के लिए बातचीत का पाखंड भरे इस्तेमाल, संप्रभु देशों के नेताओं की हत्या, इन देशों की घरेलू राजनीतिक स्थिति को अस्थिर करना और शासन परिवर्तन को उकसाना, और मुकदमा चलाने के लिए देश के नेताओं के खुलेआम अपहरण” की निंदा की.

यह बात खटकने वाली लगी और इसके प्रभाव ‘ग्रेट हॉल ऑफ़ द पीपल’ से आगे तक जा सकते हैं.

शी जिनपिंग

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इमेज कैप्शन, पिछला एक हफ्ता चीन के लिए जितना भी प्रभावशाली दिखा हो, शी के सामने अब भी चुनौतियां हैं

जब चीन अन्य जगहों पर संघर्षों को समाप्त करने की बात करता है और अमेरिकी कार्रवाइयों पर निशाना साधता है, तब यूक्रेन के मुद्दे पर उसकी चुप्पी- जहां लाखों लोग मारे जा चुके हैं- यूरोप में यह सवाल उठाएगी कि चीन वास्तव में किस हद तक एक निष्पक्ष वैश्विक खिलाड़ी के रूप में काम करने के लिए तैयार है या सक्षम है.

चीन ने यूक्रेन युद्ध में एक तटस्थ रुख बनाए रखने की कोशिश की है, हालांकि अमेरिका और यूरोप दोनों ने चीन से रूस को दी जा रही आर्थिक जीवनरेखा को काटने का आग्रह किया है.

लेकिन उसे डर है कि अगर पुतिन युद्ध हार जाते हैं तो वह एक महत्वपूर्ण सहयोगी खो देगा. इसके अलावा वह इतने बड़े पड़ोस में किसी भी अस्थिरता को लेकर भी चिंतित रहेगा.

समीर पुरी ने कहा, “साफ़ है कि इसके बारे में कुछ न कहकर शी जिनपिंग आसान रास्ता चुन सकते हैं. बेशक, इसका परोक्ष मतलब यह है कि रूस, अपने आक्रमण को जारी रखो.”

“अगर इस बारे में कोई चर्चा होती है कि युद्धविराम या युद्ध के बाद का भविष्य कैसा हो सकता है, तो मुझे हैरानी होगी. मेरा मानना है कि यह अभी भी एक बहुत अस्पष्ट सवाल है कि क्या चीन यूक्रेन में रूस के युद्ध के संदर्भ में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करना चाहता है.”

इसके विपरीत, ईरान में युद्ध चीनी हितों को नुकसान पहुंचाता है. चीन के पास तेल के भंडार हैं, लेकिन उस संकट का कोई अंत नजर नहीं आता जिसने होर्मुज़ स्ट्रेट को रोक दिया है.

एक युद्ध को समाप्त करने की अपील करना और दूसरे पर चुप रहना, दुनिया के मंच पर अधिक केंद्रीय भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे चीन के संदर्भ में शी की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है. ऐसे समय में यह यूरोप के साथ संबंधों को भी जोखिम में डालता है, जब चीन अपनी निर्यात-निर्भर अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए इन संबंधों को मज़बूत करना चाहता है.

पिछले एक हफ्ते की उच्च-स्तरीय कूटनीति में शी जिनपिंग भले ही प्रभावशाली दिखे हों लेकिन उनके सामने अब भी एक बड़ी चुनौती है. चीन का एकाधिकारवादी नेतृत्व, जो शी के तहत और मज़बूत हुआ है, अब भी कई लोगों के लिए विवादास्पद और अविश्वसनीय बना हुआ है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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