माइक्रो स्लीप चर्चा में है। सड़क सुरक्षा और नींद से जुड़ी बीमारियों के विशेषज्ञों का कहना है कि वाहन चलाते समय केवल तीन से पांच सेकंड के लिए भी मस्तिष…और पढ़ें

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। राजस्थान के दौसा में हुए भीषण बस हादसे के बाद एक बार फिर ड्राइविंग के दौरान आने वाली “माइक्रो स्लीप” चर्चा में है। सड़क सुरक्षा और नींद से जुड़ी बीमारियों के विशेषज्ञों का कहना है कि वाहन चलाते समय केवल तीन से पांच सेकंड के लिए भी मस्तिष्क का सतर्कता खो देना किसी भी व्यक्ति की जान ले सकता है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि कई बार चालक को यह पता भी नहीं चलता कि वह कुछ पल के लिए माइक्रो स्लीप की स्थिति में चला गया था।
माइक्रो स्लीप ऐसी अवस्था है, जब नींद की कमी, लगातार लंबे समय तक वाहन चलाने, अत्यधिक थकान या तनाव के कारण मस्तिष्क के कुछ हिस्से कुछ सेकंड के लिए नींद जैसी स्थिति में पहुंच जाते हैं। इस दौरान आंखें खुली भी हो सकती हैं, लेकिन चालक की प्रतिक्रिया लगभग खत्म हो जाती है। यही कुछ सेकंड सड़क पर सबसे बड़ा खतरा बन जाते हैं।
इंडियन सोसायटी आफ स्लीप मेडिसिन के अनुसार माइक्रो स्लीप आमतौर पर 10 से 15 सेकंड तक रह सकती है, हालांकि इससे कम समय की माइक्रो स्लीप भी दुर्घटना के लिए पर्याप्त होती है। यदि कोई वाहन 80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रहा हो तो केवल तीन सेकंड में वह करीब 67 मीटर और पांच सेकंड में लगभग 111 मीटर तक बिना किसी प्रभावी मानवीय प्रतिक्रिया के आगे बढ़ सकता है। यह गंभीर नार्कोलेप्सी या स्लीप एपनिया के भी लक्षण हो सकते हैं। इसके अलावा शिफ्ट वर्क डिसआर्डर भी हो सकते हैं। अत्यधिक तनाव के कारण, खर्राटे, हेवी मील, नियमित शराब का सेवन करने वालों में यह समस्या हो सकती है।
मंत्रालय की रिपोर्ट: आधी रात से सुबह के बीच होते हैं सबसे ज्यादा हादसे
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की “रोड एक्सीडेंट्स इन इंडिया-2024” रिपोर्ट भी इस खतरे की ओर संकेत करती है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में रात 12 बजे से तीन बजे के बीच 25,001 और रात तीन बजे से सुबह छह बजे के बीच 23,398 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं। यानी आधी रात से सुबह छह बजे के बीच करीब 48,400 हादसे हुए।
रिपोर्ट इन दुर्घटनाओं का कारण सीधे तौर पर माइक्रो स्लीप नहीं बताती, लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञ मानते हैं कि यही वह समय होता है, जब शरीर पर नींद का प्राकृतिक दबाव सबसे अधिक रहता है और माइक्रो स्लीप की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए लंबी दूरी की रात्रिकालीन ड्राइविंग को सबसे अधिक जोखिम भरा माना जाता है।
माइक्रो स्लीप आने से पहले शरीर देता है ये संकेत
- बार-बार जम्हाई आना
- आंखों में भारीपन या जलन महसूस होना
- बार-बार पलकें झपकना
- ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई
- पिछली कुछ किलोमीटर की ड्राइव याद न रहना
- वाहन का लेन से भटकना
- अचानक झटका महसूस होना
तीन से पांच सेकंड में कितनी दूरी तय करता है वाहन?
| रफ्तार | 3 सेकंड में दूरी | 5 सेकंड में दूरी |
| 60 किमी/घंटा | लगभग 50 मीटर | लगभग 83 मीटर |
| 80 किमी/घंटा | लगभग 67 मीटर | लगभग 111 मीटर |
| 100 किमी/घंटा | लगभग 83 मीटर | लगभग 139 मीटर |
जागृत अवस्था में आपको नींद के झटके कुछ क्षण के लिए आते हैं तो आपको ब्रेन मैपिंग या फिर पोलिसोमनोग्राफी की जांच करवाना चाहिए। इससे माइक्रो स्लीप का पता कर सकते हैं। इसमें चालक को लगता है कि वह जाग रहा है, जबकि उसकी प्रतिक्रिया लगभग समाप्त हो चुकी होती है। यदि इस तरह के कोई संकेत नजर आते हैं तो जागरूक होकर विशेषज्ञों की राय लें। – डॉ. मोनिका पोरवाल बागुल, न्यूरोलाजिस्ट (एमवाय अस्पताल)
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