भारत अपना अहम हथियार ब्रह्मोस कई देशों को क्यों बेच रहा है, क्या रूस की परमिशन ज़रूरी है?

भारत अपना अहम हथियार ब्रह्मोस कई देशों को क्यों बेच रहा है, क्या रूस की परमिशन ज़रूरी है?

ब्रह्मोस

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इमेज कैप्शन, 10 जून 2026 को रूस के क्रोनश्टाट में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समुद्री रक्षा प्रदर्शनी ‘फ्लीट-2026’ के दौरान प्रदर्शित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल

पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान जिन दो हथियारों की सबसे ज़्यादा चर्चा हुई थी, वे हैं- एस-400 और ब्रह्मोस.

एस-400 भारत ने रूस से लिया है और ब्रह्मोस भी भारत और रूस का जॉइंट वेंचर है. एस-400 डिफेंसिव हथियार है और ब्रह्मोस ऑफेंसिव है.

यानी एस-400 बाहरी हमलों को रोकता है और ब्रह्मोस हमला करता है.

ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल है और अब भारत इसका निर्यात भी कर रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी हफ़्ते इंडोनेशिया का दौरा किया था और इस दौरे में ब्रह्मोस के सौदे पर भी सहमति बनी है.

इससे पहले भारत ने फिलीपींस को भी ब्रह्मोस बेचा था. जनवरी 2022 में फिलीपींस के रक्षा सचिव डेल्फिन लोरेंजाना ने 31 दिसंबर को ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड को जारी नोटिस ऑफ अवॉर्ड में 37.4 करोड़ डॉलर (374 मिलियन डॉलर) के इस सौदे को मंज़ूरी देने की जानकारी दी थी.

ऐसे में सवाल उठता है कि भारत जब ब्रह्मोस बेचता है तो क्या रूस की भी सहमति लेनी पड़ती है?

रक्षा विश्लेषक राहुल बेदी कहते हैं, ”ब्रह्मोस के सौदे में ये सबसे अहम बात है. इस पर भारत ने कभी खुलकर नहीं कहा कि इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट किसके पास है. भारत ने ब्रह्मोस फिलीपींस को बेचा है तो बिना रूस की सहमति के संभव नहीं हुआ होगा. अब इंडोनेशिया से भी डील हो गई है. वियतनाम से भी सालों से बात चल रही है.”

राहुल बेदी कहते हैं, ”ये नहीं पता है कि बेचने के बाद जो पैसे मिलते हैं, उनमें रूस की कितनी हिस्सेदारी होती है. ज़ाहिर है कि रूस को भी हिस्सेदारी मिलती होगी. ब्रह्मोस सुपरसोनिक बहुत ही यूनिक मिसाइल है. इसे ट्रैक करना बहुत मुश्किल होता है. ये अपनी क्लास में बहुत ही उम्दा है. कई देशों ने ब्रह्मोस में दिलचस्पी दिखाई है.”

”फिलीपींस ने अपने तटीय इलाक़ों के लिए इसे डिफेंसिव रोल में लिया है. इंडोनेशिया ने भी डिफेंसिव रोल में ही लिया है. मनोहर पर्रिकर जब रक्षा मंत्री थे, तब से ही वियतनाम को ब्रह्मोस देने की बात चल रही थी लेकिन तब चीन को लेकर एक हिचक होती थी कि कहीं बुरा ना मान जाए.”

”लेकिन ये हिचक अब भारत के पास नहीं है. आज की तारीख़ में भी 20 से 30 प्रतिशत ब्रह्मोस के कंपोनेंट रूस से आते हैं. ख़ास करके इसका रेमजेंट इंजन रूस से ही आता है. अभी यह 100 फ़ीसदी भारतीय मिसाइल नहीं है.”

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इमेज कैप्शन, 26 जनवरी 2025 को नई दिल्ली के कर्तव्य पथ पर आयोजित गणतंत्र दिवस परेड के दौरान भारतीय सेना का ब्रह्मोस मोबाइल लॉन्च वाहन

इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट किसके पास?

रक्षा विश्लेषक और सोसाइटी ऑफ पॉलिसी स्टडीज़ के निदेशक सी. उदय भास्कर कहते हैं कि भारत रूस की सहमति के बिना ब्रह्मोस किसी को नहीं बेच सकता है.

उदय भास्कर ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ”रूस की सहमति अनिवार्य है. निर्यात के बाद भारत को जो पैसे मिलते हैं, उनमें भी रूस की हिस्सेदारी है. इसका इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट भारत और रूस दोनों के पास है. यह पूरी तरह से भारतीय मिसाइल नहीं है.”

”मेरा मानना है कि इसके निर्यात से सुरक्षा और सामरिक क्षेत्र में भारत की विश्वसनीयता और मज़बूत हुई है. यह बात ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जब आसियान के कई देश चीन की बढ़ती सैन्य आक्रामकता को लेकर गहरी चिंता में हैं और अपनी सुरक्षा संबंधी आशंकाओं को कम करने के लिए अपेक्षाकृत किफायती और भरोसेमंद सुरक्षा विकल्प तलाश रहे हैं.”

दिल्ली स्थिति जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में स्पेशल सेंटर फोर नेशनल सिक्यॉरिटी स्टडीज़ में असोसिएट प्रोफ़ेसर लक्ष्मण कुमार कहते हैं कि ब्रह्मोस रूस और भारत का द्विपक्षीय मामला है, इसलिए कई चीज़ें सार्वजनिक नहीं हैं लेकिन ये स्पष्ट है कि भारत ब्रह्मोस रूस की सहमति के बिना नहीं बेच सकता है.

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लक्ष्मण कुमार कहते हैं, ”ब्रह्मोस एयरोस्पेस बोर्ड ही यह फ़ैसला लेता है और इसमें रूस के भी अधिकारी शामिल हैं. बोर्ड में सहमति से फ़ैसला होता है कि किस देश को बेचना है और किसे नहीं. ब्रह्मोस शुरुआत में ज़्यादा रूस का था लेकिन अब डीआरडीओ ने इसे बहुत हद तक अपना बना लिया है. इसके बावजूद रूसी कंपोनेंट से निर्भरता ख़त्म नहीं हुई है.”

लक्ष्मण कुमार कहते हैं, ”ब्रह्मोस को केवल डिफेंस एक्सपोर्ट के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. इसका जियोपॉलिटिकल मायने भी है. इंडोनेशिया मलक्का स्ट्रेट में बहुत ही रणनीतिक लोकेशन पर स्थित है. इंडोनेशिया चीन पर निर्भरता कम करना चाहता है. इंडोनेशिया अगर मैरीटाइम क्षमता भारत से लेता है तो एक संदेश जाता है कि वह स्ट्रैटिजिक ऑटोनॉमी चाहता है. यानी वह चीन के कथित विस्तारवाद के ख़िलाफ़ है.”

भारत का रक्षा उद्योग आकार में बड़ा है, लेकिन उसका ज़्यादातर उत्पादन भारतीय सशस्त्र बलों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए होता है. इसमें भी बड़ी मात्रा में उपकरण विदेशी कंपनियों के लाइसेंस के तहत बनाए जाते हैं.

पिछले कुछ वर्षों में भारत का रक्षा निर्यात बढ़ा है और सरकार ने 2025 तक पाँच अरब डॉलर के रक्षा निर्यात का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा था. साथ ही, रक्षा उद्योग में निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी बढ़ावा दिया गया है.

इंडोनेशिया

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इमेज कैप्शन, पीएम मोदी ने इसी हफ़्ते इंडोनेशिया का दौरा किया था और ब्रह्मोस का सौदा फाइनल किया है

भारत ब्रह्मोस क्यों बेच रहा है?

ब्रह्मोस मिसाइल का विकास रूस के सहयोग से किया गया था और यह रूस की पी-800 ओनिक्स/याखोंत क्रूज़ मिसाइल पर आधारित है.

इसके मौजूदा संस्करण की मारक क्षमता लगभग 500 किलोमीटर है, लेकिन निर्यात संस्करण की रेंज 290 किलोमीटर रखी गई है ताकि वह मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) की 300 किलोमीटर सीमा के भीतर रहे.

2004 में पहली बार परीक्षण के बाद इस मिसाइल को 2007 से भारतीय सेनाओं में शामिल किया गया. इसके अलग-अलग एडिशन भारतीय थलसेना, वायुसेना और नौसेना के पास ऑपरेशनल हैं.

फिलीपींस को जो एडिशन दिया गया है, वह नौसैनिक है. फिलीपींस के रक्षा सचिव ने कहा था कि, “फिलीपीन मरीन की कोस्टल डिफेंस रेजिमेंट इस आधुनिक रणनीतिक रक्षा क्षमता का मुख्य उपयोगकर्ता होगी.”

चेलानी

सोशल मीडिया पर इस समझौते की जानकारी देते हुए लोरेंजाना ने कहा था, “हेड ऑफ प्रोक्योरिंग एंटिटी के रूप में मैंने हाल ही में फिलीपीन नौसेना की शोर-बेस्ड एंटी-शिप मिसाइल एक्विज़िशन प्रोजेक्ट के लिए नोटिस ऑफ अवॉर्ड पर हस्ताक्षर किए हैं. इस परियोजना में तीन मिसाइल बैटरियों की आपूर्ति, ऑपरेटरों और रख-रखाव कर्मियों का प्रशिक्षण, के साथ ज़रूरी इंटीग्रेटेड लॉजिस्टिक्स सपोर्ट पैकेज भी शामिल है.”

भारत जिन देशों को ब्रह्मोस दे रहा है, उनके समुद्री और क्षेत्रीय विवाद चीन से हैं. डॉ लक्ष्मण कुमार कहते हैं कि ऐसे में उन देशों की सैन्य क्षमता बढ़ाकर भारत दक्षिण चीन सागर में चीन के सामने चुनौतियां बढ़ा रहा है.

डॉ. लक्ष्मण कुमार कहते हैं, ”भारत के लिए यह रणनीतिक रूप से फ़ायदेमंद है कि चीन अपने पड़ोस में ही पर्याप्त चुनौतियों में उलझा रहे. इससे उसका ध्यान बँटेगा और वह भारत के साथ हिंद महासागर क्षेत्र पर उतना दबाव नहीं बना पाएगा.”

भारतीय रक्षा विश्लेषक और ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटिजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट में रेज़िडेंट सीनियर फेलो राजेश्वरी पिल्लई राजगोपालन के मुताबिक, ब्रह्मोस मिसाइल सौदा सिर्फ़ सैन्य ताक़त बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका बड़ा रणनीतिक संदेश भी है.

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इमेज कैप्शन, 23 जनवरी 2006 को नई दिल्ली के राजपथ पर गणतंत्र दिवस परेड की फुल ड्रेस रिहर्सल के दौरान प्रदर्शित ब्रह्मोस मिसाइल

ब्रह्मोस अहम क्यों?

राजगोपालन ने हॉन्ग कॉन्ग की न्यूज़ विश्लेषण वेबसाइट साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (एससीएमपी) से कहा, “भले ही इंडोनेशिया दक्षिण चीन सागर विवाद में दावेदार देश नहीं है, लेकिन चीन ने इंडोनेशिया के विशेष आर्थिक क्षेत्र और नातुना द्वीपों के आसपास जिस तरह अतिक्रमण किया है, वह चिंता का विषय रहा है. ब्रह्मोस सौदे को कम से कम समुद्री क्षेत्र में सीमित प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने की कोशिश के रूप में देखा जाना चाहिए.”

उन्होंने कहा, ”यह सौदा भारत के लिए रणनीतिक और व्यावसायिक, दोनों दृष्टि से बड़ी सफलता है. भारत ने आख़िरकार अपनी पुरानी झिझक छोड़ दी है और अब वह चीन के ख़िलाफ़ प्रभावी ढंग से जवाब देने में दूसरे देशों की मदद कर रहा है.”

एससीएमपी से ही सिंगापुर के एस. राजरत्नम स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज़ के इंडोनेशिया कार्यक्रम से जुड़े रिसर्च फेलो अधि प्रियमारिज़की ने कहा, ”इंडोनेशिया के पास पहले से रूस निर्मित सुखोई लड़ाकू विमानों का बेड़ा है, जो ब्रह्मोस मिसाइल के साथ पहले से ही अनुकूल है. इसलिए यह सौदा स्वाभाविक रूप से उपयुक्त है. उन्होंने कहा कि भविष्य में भारत के रक्षा निर्यात के लिए इंडोनेशिया एक ऐसे ग्राहक के रूप में काफ़ी संभावनाएं रखता है.”

सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी मानते हैं कि ब्रह्मोस उन देशों के लिए अहम हथियार बनकर उभरा है, जो अमीर नहीं है. चेलानी ने एक्स पर दो जून को लिखा था, ”रणनीतिक दृष्टि से ब्रह्मोस कम संसाधन वाले देशों के लिए एक ऐसा हथियार बनकर उभरा है, जो समुद्री शक्ति के संतुलन को बदल सकता है. अपेक्षाकृत कम लागत वाली यह मिसाइल कहीं अधिक शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी पर भी असमान रूप से भारी पड़ने की क्षमता रखती है.”

चेलानी ने लिखा है, ”मैक 2.8 से 3.0 की रफ्तार से उड़ने वाली ब्रह्मोस, यानी ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज़, दुनिया की अहम सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल मानी जाती है. चूंकि काइनेटिक एनर्जी स्क्वेयर वैलुसिटी के अनुपात में बढ़ती है, इसलिए भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और रूस की एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया के जॉइंट वेंचर के तहत विकसित ब्रह्मोस, अमेरिका की हार्पून और फ्रांस की एक्सोसेट जैसी पारंपरिक सबसोनिक क्रूज़ मिसाइलों की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी प्रभाव पैदा करती है.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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