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मप्र के ग्रामीण इलाकों में किसान साल भर गोबर एक जगह इकट्ठा करते हैं और मई-जून में उसे खेत में फैला देते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि ऊपर से सूखा दिखने वाला गोबर अंदर से कच्चा होता है। यह कच्चा गोबर खेत में जाकर मिट्टी का तापमान बढ़ा देता है और ‘सफेद लट’ व दीमक जैसे कीट पैदा करता है। दरअसल, कच्चे गोबर की गंध से आकर्षित होकर ‘रूट बोरर’ और ‘व्हाइट ग्रब’ (सफेद लट) के भृंग मिट्टी में अंडे दे देते हैं। इसके बाद जब मानसून की पहली बारिश होती है, तो ये अंडे सक्रिय होकर लट बन जाते हैं और फसलों की जड़ों को पूरी तरह चबा जाते हैं। इससे बचाव के लिए बाद में किसानों को हजारों रुपए की महंगी कीटनाशक दवाएं छिड़कनी पड़ती हैं, जिससे खेती की लागत दोगुनी हो जाती है। जबकि, खेतों में हमेशा ‘अच्छी सड़ी खाद’ ही डालनी चाहिए। असली खाद की पहचान यह है कि वह पूरी तरह गहरे काले या कत्थई रंग की, चायपत्ती जैसी भुरभुरी और बिल्कुल गंधहीन होती है। जबकि कच्चा गोबर ढीला, हल्के पीले-भूरे रंग का और बदबूदार होता है, जो मिट्टी को सुधारने के बजाय उसे बीमार कर देता है। कच्चे गोबर को ‘काला सोना’ बनाने का प्रैक्टिकल तरीका यदि आपके पास इकट्ठा किया गया गोबर पूरी तरह सड़ा हुआ नहीं है, तो उसे खेतों में फेंकने के बजाय मात्र 15 से 20 दिनों में ‘वेस्ट डीकंपोजर’ या ‘ट्राइकोडर्मा’ की मदद से बेहतरीन खाद में बदला जा सकता है। इसके लिए किसान भाई सबसे पहले एक प्लास्टिक के ड्रम में 200 लीटर पानी लें। इसमें 2 किलो गुड़ और एक बोतल वेस्ट डीकंपोजर कल्चर मिलाकर घोल तैयार कर लें। इस घोल को 5 दिनों तक सुबह-शाम लकड़ी से हिलाएं, जिससे यह पूरी तरह तैयार हो जाएगा। इसके बाद अपने गोबर के ढेर पर इस पानी का अच्छी तरह छिड़काव कर दें और उसे तिरपाल या पुआल से ढक दें। यदि आप फंगस जनित बीमारियों से भी फसल को बचाना चाहते हैं, तो प्रति टन गोबर में 1 से 2 किलो ‘ट्राइकोडर्मा विरिडी’ पाउडर मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर ढेर बना दें। यह जैविक फफूंदनाशक गोबर को तेजी से सड़ाता भी है और मिट्टी में मौजूद हानिकारक फंगस को भी नष्ट कर देता है। खाद डालने के तुरंत बाद खेत की गहरी जुताई जरूरी ज्यादातर किसान भाई मई-जून के महीनों में खेतों में गोबर की खाद डालकर उसे कई दिनों तक तेज धूप में खुला छोड़ देते हैं, जो कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिल्कुल गलत है। सड़ी हुई खाद में मुख्य रूप से नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्व अमोनिया के रूप में मौजूद होते हैं। जब इस खाद पर जेठ की चिलचिलाती धूप सीधे पड़ती है, तो वाष्पीकरण के कारण इसके सबसे कीमती पोषक तत्व गैस बनकर हवा में उड़ जाते हैं और खेत को सिर्फ सूखी मिट्टी मिलती है। इसलिए नियम बना लें कि ट्रैक्टर या ट्रॉली से खेत में खाद बिखेरने के तुरंत बाद (अधिकतम 24 घंटे के भीतर) कल्टीवेटर या रोटावेटर चलाकर खेत की जुताई कर दें। ऐसा करने से खाद सीधे मिट्टी की निचली परतों में दब जाती है, धूप से सुरक्षित रहती है और पहली बारिश होते ही पूरी तरह घुलकर पौधों की जड़ों को पोषण देने के लिए तैयार हो जाती है। वर्मीकम्पोस्ट: केंचुए से कब, कैसे और क्यों बनाएं खाद? कब और कौन से केंचुए चुनें: वर्मीकम्पोस्ट (केंचुआ खाद) बनाने का सबसे सही समय मई से जून के बीच होता है, ताकि खरीफ सीजन की बुवाई में इसका इस्तेमाल हो सके। इसके लिए हमेशा ‘आइसीनिया फोटिडा’ प्रजाति के केंचुओं का ही चयन करना चाहिए। ये लाल रंग के केंचुए होते हैं जो मप्र की जलवायु के अनुकूल हैं, ऊपरी सतह पर रहते हैं और मिट्टी खाने के बजाय सिर्फ गोबर व जैविक कचरे को बहुत तेजी से खाते हैं। खाद बनाने का तरीका: छायादार स्थान या छप्पर के नीचे 10 फीट लंबी, 3 फीट चौड़ी और 2 फीट गहरी पक्की ईंटों की बेड (क्यारी) बनाएं। इसमें नीचे कंकड़ और सूखी पत्तियां डालें, फिर उसके ऊपर 15-20 दिन पुराना ठंडा हो चुका गोबर भरें (ताजा गर्म गोबर कभी न डालें, वर्ना केंचुए मर जाएंगे)। इसके बाद बेड पर केंचुए छोड़कर ऊपर से टाट की बोरियों से ढक दें और रोजाना हल्का पानी छिड़ककर नमी बनाए रखें। दो महीने में चायपत्ती जैसी खाद ऊपर जमा हो जाएगी। उपयोग और लाभ: इस खाद का उपयोग धान, सोयाबीन, मक्का जैसी सभी फसलों में आखिरी जुताई के समय प्रति एकड़ 8 से 10 क्विंटल की दर से करना चाहिए। यह खाद हर तरह की मिट्टी (विशेषकर मप्र की भारी काली और हल्की पीली मिट्टी) के जलधारण की क्षमता को बढ़ाती है। इसमें सामान्य गोबर खाद की तुलना में 5 गुना अधिक नाइट्रोजन और 8 गुना अधिक पोटाश होता है, जो खरीफ फसलों में दानों की चमक और बंपर पैदावार सुनिश्चित करता है। किस खेत में कितनी मात्रा और कब डालें यह जैविक खाद
तैयार जैविक खाद का पूरा लाभ तभी मिलता है जब उसे सही मात्रा में सही समय पर दिया जाए। सामान्य रूप से अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद को प्रति एकड़ 4 से 5 टन (लगभग 2 से 3 ट्रॉली) बुवाई से ठीक 15 दिन पहले खेत में बिखेरकर जुताई कर देनी चाहिए। वहीं अगर आप केंचुआ खाद (वर्मीकम्पोस्ट) का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो मक्का, ज्वार और बाजरा जैसी फसलों के लिए आखिरी जुताई के समय प्रति एकड़ 10 से 12 क्विंटल खाद डालना पर्याप्त होता है। सोयाबीन, मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलों की जड़ों में नाइट्रोजन फिक्स करने वाली ग्रंथियां होती हैं, इसलिए इनमें प्रति एकड़ 6 से 8 क्विंटल केंचुआ खाद बुवाई के वक्त कूट (लाइनों) में देना सबसे ज्यादा फायदेमंद रहता है। धान की फसल में रोपाई से ठीक पहले लेव (कादों) करते समय प्रति एकड़ 12 से 15 क्विंटल वर्मीकम्पोस्ट मिट्टी में मिला देने से पौधों का फुटाव तेजी से होता है और कल्ले मजबूत निकलते हैं। एक्सपर्ट: डॉ. सुभाष सी. पांडे, पर्यावरणविद् एवं जैविक कृषक ने बताया- किसान भाई ध्यान दें… मई-जून में सीधे खेत में कच्चा गोबर डाला तो से सफेद लट और दीमक को खुद दे देंगे न्यौता; बारिश के बाद ये फसलों की जड़ों को पूरी तरह से चबा जाएंगे। असली गोबर खाद की पहचान यह है कि वह पूरी तरह गहरे काले या कत्थई रंग की, चायपत्ती जैसी भुरभुरी और बिल्कुल गंधहीन होती है।
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