नाना पाटेकर चले गए। यह कहते हुए भी भीतर का कोई सच कहता है कि नहीं, बात अभी पूरी नहीं हुई है। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो जब जाते हैं, तो पीछे छोड़ जाते हैं हवा में अपनी आवाज का भारीपन, एक खास तरह का गुस्सा, जो कभी किसी अन्याय के खिलाफ उबला था और वह अचानक फूट पड़ने वाली हंसी, जो किसी बच्चे की निश्छलता जैसी साफ थी।
वह अभिनेता थे। बहुत बड़े अभिनेता। लेकिन शायद इससे भी पहले वह एक आदमी थे। मायानगरी ने उन्हें पहचान दी। फिल्मों ने उन्हें लाखों लोगों तक पहुंचाया। ‘अंकुश’, ‘प्रहार’, ‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अब तक छप्पन’, ‘नटसम्राट’, ‘कोहराम’, ‘तिरंगा’, ‘वेलकम’ जैसी ढेर सारी फिल्मों में दिखाई देने वाले चेहरे अलग-अलग थे, लेकिन उनके भीतर का आदमी कहीं न कहीं एक ही था। वह आदमी, जो अन्याय देखकर चुप नहीं रह सकता था। मैंने उन्हें हमेशा ऐसे दरवाजे की तरह देखा, जो कभी पूरी तरह बंद नहीं होता और जब खुलता है तो एक झटके के साथ खुलता है। उनकी आवाज में मराठा माटी की वह सोंधी और तीखी गंध थी, जो जब बोलती थी, तो मुंबई की बड़ी-बड़ी इमारतों के बीच एक खाली सड़क की याद दिलाती थी। उनके चेहरे पर एक ही समय में दो मौसम रहते थे-एक तपती हुई धूप, जहां अन्याय का गुस्सा पकता था और दूसरी अचानक बरस जाने वाली बारिश, जो किसी अबोध बच्चे की हंसी की तरह निर्मल थी।


