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सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को पुलिस शनिवार तड़के जंतर-मंतर से जबरन हटाकर सफ़दरज़ंग अस्पताल ले गई.
सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि ने बताया कि उनके पति को सफ़दरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया है.
गीतांजलि ने कहा कि उनके, उनके परिवार और सोनम वांगचुक की सेहत पर नज़र रखने वाले डॉक्टरों की सहमति के बगैर उन्हें मुँह या नसों के माध्यम से कोई भी दवा या तरल पदार्थ न दिया जाए.
नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं के ख़िलाफ़ सोनम वांगचुक पिछले 20 दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल कर रहे थे. लेकिन शनिवार की सुबह उन्हें वहाँ से हटा दिया गया.
दिल्ली पुलिस ने कहा कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद सोनम वांगचुक को यहाँ से हटाया जा रहा है.
दिल्ली हाई कोर्ट ने जो निर्देश दिया था, उसका मतलब ये था कि अगर सोनम वांगचुक की हालत ख़राब होती है तो उन्हें अस्पताल में ले जाया जा सकता है.
किसान नेता डल्लेवाल के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था
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सुप्रीम कोर्ट के कई फ़ैसले और आदेश में इस बात पर साफ़ ज़ोर दिया गया है कि भूख हड़ताल पर बैठे किसी शख़्स की ज़िंदगी की हिफ़ाजत करना सरकार की ज़िम्मेदारी है.
लेकिन साथ में ये भी सुनिश्चित करना होगा कि उसकी असहमति जताने के अधिकार में कोई बाधा न आए.
सोनम वांगचुक के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी कहा था कि ‘हर नागरिक की ज़िंदगी बेशकीमती है’.
2024 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और पंजाब सरकार को निर्देश दिया था कि वे भूख हड़ताल पर बैठे किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल को पर्याप्त मेडिकल मदद उपलब्ध कराएं और साथ ही उनके आंदोलन जारी रखने के फ़ैसले का सम्मान करें.
2024 के आख़िरी महीनों में 70 साल अधिक उम्र के डल्लेवाल किसानों की मांगों को लेकर पंजाब और हरियाणा के बीच स्थित शंभू और खनौरी बॉर्डर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए थे. उनका अनशन 20 दिन पार कर चुका था.
26 नवंबर 2024 को पुलिस डल्लेवाल को यहां से जबरन उठाकर लुधियाना के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया था, हालांकि किसानों के दबाव के चलते पुलिस ने डल्लेवाल को रिहा कर दिया था.
तब अदालत ने कहा था कि केंद्र सरकार और पंजाब सरकार को डल्लेवाल की उम्र, उनकी सेहत से जुड़ी दिक्क़तों और इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि वह एक अहम नागरिक हैं.
बाबा रामदेव के मामले में अदालत का रुख़
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इसी तरह का फ़ैसला बाबा रामदेव के मामले में भी दिया था.
सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में दिल्ली के रामलीला मैदान में यूपीए सरकार के ख़िलाफ़ चल रहे धरने को लेकर दिए गए फ़ैसले का भी ज़िक्र किया था.
‘द हिंदू’ के मुताबिक़ उस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर दिए गए फ़ैसले में कहा था कि बाबा रामदेव को यूपीए सरकार ने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ प्रस्तावित भूख हड़ताल से रोकने की कोशिश की थी.
फ़ैसले में कहा गया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने बाबा रामदेव को अनशन का फ़ैसला छोड़ने को बाध्य करने के लिए ‘अपनी ओर से हरसंभव कोशिश’ की थी.
फै़सले के मुताबिक़, ”चार मई 2011 को बाबा रामदेव ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर लिखकर काले धन को वापस लाने के मुद्दे पर सरकार की कथित निष्क्रियता के ख़िलाफ़ भूख हड़ताल पर बैठने का इरादा जताया था. इसके जवाब में 19 मई 2011 को प्रधानमंत्री ने उन्हें पत्र लिखकर भरोसा दिलाया कि सरकार भ्रष्टाचार से निपटने के लिए प्रतिबद्ध है और उनसे आमरण अनशन का विचार छोड़ने का अनुरोध किया था.”
इसी फ़ैसले में यह भी दर्ज़ है कि एक जून 2011 को जब बाबा रामदेव दिल्ली पहुंचे, तो यूपीए सरकार के चार वरिष्ठ मंत्रियों ने हवाई अड्डे पर उनसे मुलाक़ात कर उन्हें भूख हड़ताल न करने के लिए मनाने की कोशिश की थी.
बाद में एनसीआर के होटल क्लैरिस में भी मंत्रियों और बाबा रामदेव के बीच इस मुद्दे पर बैठक हुई थी.
‘अनशन करने वालों से टकराव का रास्ता न अपनाएं’
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‘द हिंदू’ ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ”सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फ़ैसलों में साफ़ किया है कि सरकार को अपनी बात रखने के लिए अनशन का सहारा लेने वाले लोगों के प्रति टकराव का रवैया नहीं अपनाना चाहिए.’
अदालत ने कहा है, ”अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में तभी दखल दिया जा सकता है, जब सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ने, सामाजिक अव्यवस्था फैलने या सार्वजनिक शांति भंग होने के वास्तविक और उचित आधार हों.”
”भूख हड़ताल न तो असंवैधानिक है और न ही किसी क़ानून के तहत उस पर रोक है.”
”सरकार के किसी फ़ैसले या कार्रवाई के विरोध में किसी व्यक्ति का अनिश्चितकालीन अनशन अपने आप में सार्वजनिक व्यवस्था के लिए ख़तरा नहीं माना जा सकता.”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “यह विरोध जताने का एक ऐसा तरीका है, जिसे इतिहास और हमारे संवैधानिक न्यायशास्त्र, दोनों ने मान्यता दी है. इसकी प्रेरणा महात्मा गांधी के सत्याग्रह से मिलती है.”
अदालत ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि ऐसे मामलों में राज्य का दायित्व है कि वह आगे बढ़कर व्यक्ति के जीवन की रक्षा के लिए हरसंभव कोशिश करे.
क्या किसी मांग को लेकर कई दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठना और इलाज उपलब्ध कराने के अधिकारियों के प्रयासों में सहयोग न करना आईपीसी की धारा 309 (आत्महत्या का प्रयास) के तहत आपराधिक अपराध माना जाएगा?
फ़रवरी 2021 में मद्रास हाई कोर्ट ने इस क़ानूनी सवाल का साफ़ जवाब ‘नहीं’ में दिया था.
ऐसे ही एक मामले को ख़ारिज करते हुए तब जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश ने कहा था, “भूख हड़ताल आईपीसी की धारा 309 के तहत अपराध नहीं बनता. रिकॉर्ड पर उपलब्ध सभी तथ्यों को ज्यों का त्यों स्वीकार भी कर लिया जाए, तब भी धारा 309 के तहत कोई अपराध सिद्ध नहीं होता.”
अधिवक्ता पी. पुगलेंधी ने अदालत को बताया था कि याचिकाकर्ता पी. चंद्रकुमार को 2013 में पूनामल्ली उप-जेल परिसर में संचालित एक विशेष शरणार्थी शिविर में रखा गया था.
सामान्य शरणार्थी शिविरों के विपरीत, विशेष शिविरों में रहने वालों को आवाजाही की स्वतंत्रता नहीं थी और उन्हें बाहर जाने की अनुमति भी नहीं थी.
इसी के विरोध में याचिकाकर्ता ने 15 अगस्त से 24 अगस्त 2013 तक क़रीब 10 दिनों तक भूख हड़ताल की.
उन पर यह आरोप भी लगाया गया कि जब लगभग 10 दिनों तक चले इस विरोध के कारण उनकी तबीयत बिगड़ गई और स्थानीय तहसीलदार ने उन्हें मेडिकल मदद उपलब्ध कराने की कोशिश की, तब उन्होंने इलाज कराने में सहयोग नहीं किया.
न्यायपालिका ने लगातार जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार (अनुच्छेद 19) के बीच संतुलन बनाए रखने पर ज़ोर दिया है.
‘पुलिस की कार्रवाई अदालत की अवमानना’
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कॉकरोच जनता पार्टी ने पुलिस की कार्रवाई को ‘अदालत की अवमानना’ करार दिया है.
कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरव दास ने कहा, ”दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश में कहा गया था कि सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य की निगरानी होनी चाहिए. अगर हालत बहुत ज़्यादा ख़राब हो जाए और उनकी जान को ख़तरा हो तब डॉक्टर की सलाह पर आगे बढ़ना चाहिए.”
”दिल्ली हाई कोर्ट का ये आदेश था. लेकिन दिल्ली पुलिस गुमराह कर रही है. वो कह रही है कि अदालत के इसी आदेश की वजह से वो सोनम वांगचुक को लेने आई है. ये झूठ है और अदालत की अवमानना है. कोर्ट के आदेश को ग़लत तरीके से व्याख्या करके वो सोनम वांगचुक लेकर चले गए.”
कांग्रेस के मीडिया और पब्लिसिटी डिपार्टमेंट के चेयरमैन पवन खेड़ा ने सोनम वांगचुक को जबरन असप्ताल ले जाने पर लिखा है, ”हमारा संविधान असहमति जताने का अधिकार देता है. लेकिन ऐसा लगता है कि गृह मंत्रालय इस अधिकार को दबाने पर आमादा है.”
”दिल्ली पुलिस सीधे गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है. इसी मंत्रालय ने शुक्रवार को ही दिल्ली के नए पुलिस आयुक्त की नियुक्ति की है. अगर शनिवार की कार्रवाई उनके कार्यकाल का पहला निर्देश है, तो यह बेहद चिंताजनक संदेश देता है कि संवैधानिक कर्तव्य से ज़्यादा अहमियत राजनीतिक आदेशों को दी जा रही है.”
जाने-माने वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने लिखा, ” सरकार को लगा था कि सीजेपी के विरोध प्रदर्शन और वांगचुक का अनशन कुछ समय बाद अपने आप ख़त्म हो जाएगा, इसलिए उसने इसे नजरअंदाज किया. लेकिन जंतर-मंतर पर हर ओर से उमड़ते समर्थन और बढ़ती भीड़ को देखकर सरकार आखिरकार घबरा गई.”
”20 मार्च को संसद तक प्रस्तावित मार्च बहुत बड़ा होने वाला है.क्या इसे रोकने के लिए सरकार पूरे शहर को बंद कर देगी?”
वकील आशीष गोयल ने लिखा, ” जब कोई व्यक्ति सत्तारूढ़ सरकार से जवाबदेही की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठता है, तो उस सरकार को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह ख़ुद तय करे कि उस व्यक्ति को कब, कैसे और कहां अस्पताल में भर्ती किया जाए. ऐसा करना सरकार को मनमर्जी से हस्तक्षेप कर अनशन खत्म कराने की छूट देना होगा, जो बेहद ख़तरनाक और फासीवादी प्रवृत्ति की निशानी है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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