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राजेश मेहता हैरान हैं. सेबी ने उनकी कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स को एक अंतरिम आदेश भेजा है.
इसमें पूछा गया है कि राजस्व ज़्यादा क्यों दिखाया और मुनाफ़ा इतना कम क्यों है. मेहता को समझ नहीं आ रहा कि इस पर इतना शोर क्यों मच रहा है.
लेकिन मेहता नाराज़ भी हैं. बीमा कंपनी एलआईसी ने उनकी कंपनी में हिस्सेदारी एक फ़ीसदी से बढ़ाकर 10.8 फ़ीसदी कर दी है. इसके बाद से सब उन पर टूट पड़े हैं.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बात करते हुए मेहता कहते हैं, “सब एलआईसी-एलआईसी चिल्ला रहे हैं. हमने उन्हें शेयर ख़रीदने के लिए नहीं कहा. उन्होंने पिछले 10, 15 या शायद 20 साल में खुले बाज़ार से शेयर ख़रीदे हैं. कंपनी या प्रमोटर ने उन्हें शेयर नहीं दिए हैं.”
उनका कहना है, “मुझे यह समझ नहीं आ रहा है कि ये अफ़वाह कहां से आई कि कंपनी ने दबाव में एलआईसी को शेयर दिए? एलआईसी ने ऊंचे दाम पर शेयर बेचे भी हैं. उसे अच्छा फ़ायदा हुआ है. मुझे लगता है कि एलआईसी को पता है, हमें पता है और यहां तक की जनता को भी पता है कि यह कंपनी काफ़ी मज़बूत है. इसीलिए एलआईसी ने निवेश किया है.”
राजेश एक्सपोर्ट्स सेबी की नज़र में क्यों आई?
बुधवार को सेबी ने कंपनी को अंतरिम आदेश जारी किया. इस आदेश के चलते सोना रिफ़ाइन करने और गहने बनाने वाली कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स पर शेयर बाज़ार में कारोबार करने पर रोक लगा दी गई है.
आदेश में कहा गया कि 2021 से 2025 के बीच कंपनी ने आंकड़ों में हेरफेर की. इस तरह कुल राजस्व 15 लाख करोड़ रुपये दिखाया गया.
यह मुख्यतः स्विट्ज़रलैंड की सहायक कंपनी वैलकैम्बी के कारोबार की वजह से था. वैलकैम्बी सोने-चांदी की कच्ची धातु ख़रीदती है और उसमें से शुद्ध सोना निकालती है. ऐसा करने के बाद वह उसे दुनियाभर के बैंकों और बुलियन डीलरों को बेचती है.
सेबी ने यह जांच एक शेयरधारक की शिकायत पर शुरू की थी. शिकायत में कंपनी के वित्तीय रिकॉर्ड में गड़बड़ी का आरोप था. 109 पन्नों के आदेश में कहा गया कि कंपनी ने कुल राजस्व का 99.8 फीसदी ग़लत तरीके़ से दिखाया.
ऑडिटरों को अफ्रीका में सोने की खदान के मालिकाना हक का कोई सबूत नहीं मिला.
मेहता का कहना है, “वह खदान सिंगापुर वाली हमारी सहायक कंपनी की है और उससे जुड़े दस्तावेज़ हमने दे दिए हैं.”
मेहता ने बताया कि सेबी ने करीब ढाई साल पहले जांच शुरू की थी.
उनका कहना है, “सेबी ने हमसे जो भी सवाल किए, हमने उनका जवाब दिया है. हमने फोरेंसिक ऑडिटरों को भी जवाब दिए हैं. हमें लगा कि उन्हें कुछ नहीं मिला है. मुझे लगता है कि सेबी हमारे जवाबों से संतुष्ट है. पिछले तीन महीने से हमसे कोई भी सवाल नहीं किया गया. बुधवार को अचानक वेबसाइट पर आदेश डाल दिया गया, जो हमारी समझ से परे है.”
15 लाख करोड़ का राजस्व कैसे पहुंचा?

मेहता बताते हैं, “यह पांच साल का राजस्व है. यह हमारी आमदनी नहीं है. यह हमारी सहायक कंपनी का कारोबार है. यह राजस्व सोना बेचने से आया है. इसमें गलत क्या है?”
वो कहते हैं, “स्विट्ज़रलैंड में पूरा टैक्स चुकाया गया है. हर साल करीब पांच लाख करोड़ रुपये का राजस्व बनता है. लोगों ने इसे लेकर हंगामा मचा दिया और इसे घोटाला करार दे दिया, जो मेरी समझ से बाहर है.”
उन्होंने कहा कि सोने का कारोबार बहुत बड़े पैमाने पर होता है, क्योंकि सोने की कीमत हमेशा काफी अधिक रहती है, इसी वजह से इस काम का कुल कारोबार बहुत बड़ा दिखाई देता है, लेकिन इससे होने वाला मुनाफ़ा काफी कम होता है.
वो कहते हैं कि सोने को शुद्ध करने और बेचने के कारोबार में बिक्री की रकम तो बहुत बड़ी होती है, लेकिन मार्जिन कम रहता है.
वो कहते हैं, “मैं ऐसा नहीं कहूंगा कि इसमें सेबी की ग़लती है. एक अंतरराष्ट्रीय मानक होता है. भारत में कोई गोल्ड रिफ़ाइनरी नहीं है. शायद सेबी को यह नहीं पता कि रिफ़ाइनरी में राजस्व ज़्यादा और मुनाफ़ा कम होता है. सेबी ने हमसे और दस्तावेज़ मांगे हैं और अपने पत्र में लिखा है कि यह मामला संदिग्ध लगता है.”
राजेश एक्सपोर्ट्स में क्या किसी कंपनी की दिलचस्पी है?
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मेहता का कहना है, “राजेश एक्सपोर्ट्स पहले ही 400 से 450 जीबी डेटा दे चुकी है. साथ में सेबी और फॉरेंसिक ऑडिटर्स को 70 से 80 हज़ार काग़ज़ात भी दिए हैं.”
वो कहते हैं, “अगर वैलकैम्बी 100 रुपये का सोना खरीदे और रिफ़ाइनिंग के बाद 101 रुपये में बेचे, तो ऑडिट में राजस्व 101 रुपये दिखाई देगा, लेकिन इसमें शुद्ध बचत सिर्फ एक रुपये ही होगी.”
उन्होंने कहा कि सेबी का यह अंतरिम आदेश दरअसल सवालों की एक सूची जैसा है, जिसमें कुछ स्पष्टीकरण और जानकारी मांगी गई है.
लेकिन मेहता इस बात से हैरान हैं कि आदेश जारी होने से पहले ही इस मामले को लेकर काफी हलचल और विवाद शुरू हो गया था.
तो क्या कोई बड़ी कॉरपोरेट कंपनी, आपकी कंपनी में दिलचस्पी रखती है?
मेहता का कहना है, “सच कहूं तो इस स्थिति में दोस्त और दुश्मन की पहचान मुश्किल हो गई है. जो यह सब फैला रहा है, वह जानता है कि वह झूठ बोल रहा है. अगर ये बातें सच होती तो मैं आपके सामने नहीं बैठा होता.”
उन्होंने बताया कि कंपनी ने सेबी को जवाब देने की तैयारी शुरू कर दी है.
मेहता का कहना है, “हमें एक महीने का समय मिला है, लेकिन हम 10 से 15 दिन में जवाब दे देंगे. मुख्यतः 8 से 10 बिंदुओं पर हमें जवाब देना है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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