
सुनवाई के दौरान सामान्य वर्ग के अधिवक्ता प्रदीप संचेती की ओर से राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन पर ही सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि, डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय को सर्वे का काम आयोग की वर्ष 2022 की रिपोर्ट के आधार पर सौंपा गया था, लेकिन आयोग का गठन स्वतंत्र नहीं था, क्योंकि इसके तीनों सदस्य विधायक थे। नियमों के विपरीत अलग – अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व न होने से इसकी कार्यप्रणाली राजनीतिक प्रभाव से मुक्त नहीं मानी जा सकती।
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