13 साल का दर्द, स्पॉटलाइट हटते ही दिखा अंधेरा

13 साल का दर्द, स्पॉटलाइट हटते ही दिखा अंधेरा



13 साल का दर्द, स्पॉटलाइट हटते ही दिखा अंधेरा

एक वक्त था, जब जॉनी लीवर के पास वक्त नहीं था. महीने में चार-पांच फिल्में रिलीज होती थीं और एक दिन में पांच फिल्मों की शूटिंग करना भी उनके लिए आम बात थी. एक प्रोड्यूसर को दो घंटे दिए, फिर दूसरे सेट पर पहुंचे, रात में डबिंग की और वहीं से अगली सुबह शूटिंग के लिए निकल गए. कई-कई दिन ऐसे बीते, जब मुंबई में रहते हुए भी घर जाने का वक्त नहीं मिला.

फिर जिंदगी ने करवट ली और करीब 13 साल तक काम उनके पास नहीं आया.

70 साल के जॉनी लीवर जब उस दौर को याद करते हैं, तो उनका गला भर आता है. वह कहते हैं,’जब आपसे स्पॉटलाइट हटती है, तो एक अंधेरा नजर आता है.’ जिस कलाकार को देखते ही कभी भीड़ घेर लेती थी, लोग उससे तस्वीरें खिंचवाने से बचने लगे.जिन लोगों के साथ सालों काम किया, उनके फोन और मैसेज आने बंद हो गए.जॉनी के लिए यह वक्त आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने खुद को कमजोर नहीं होने दिया.

जन्मदिन के मौके पर प्रभात खबर के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत में जॉनी लीवर ने अपने करियर के सबसे मुश्किल दौर से लेकर पहली फीस, कॉमेडी के बदलते अंदाज, आज के स्टैंडअप कॉमेडियन्स, सोशल मीडिया, गोविंदा और इंडस्ट्री में बदलते रिश्तों पर खुलकर बात की. उन्होंने यह भी बताया कि 70 की उम्र में उनकी एक पुरानी ख्वाहिश अब पूरी होने जा रही है.

70 के हो गए, कोई ख्वाहिश अब भी अधूरी है?

वैसे 70 का हो गया हूं, लेकिन बिल्कुल 50 का लगता हूं. रही बात अधूरी ख्वाहिश की, तो हां, एक बहुत इच्छा थी कि किसी फिल्म में लीड हीरो के रूप में परफॉर्म करूं. हालांकि ऊपरवाले की दुआ है कि अब यह भी पूरी हो जाएगी.फरवरी में मेरी फिल्म रिलीज होगी, जिसमें मैंने मेन लीड का किरदार निभाया है. इसमें सलमान खान, आमिर खान, अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी और तब्बू जैसे एक्टर्स गेस्ट अपीयरेंस में होंगे. कहानी बहुत अलग है. इसमें एक डिफरेंट जॉनी लीवर फैंस को दिखेगा. लगा था कभी यह इच्छा पूरी नहीं हो पाएगी, लेकिन सब उसका करम है.फिल्म का नाम है ‘सबसे बड़ा रुपया’.

आपकी असल जिंदगी से इंस्पायर है?

नहीं, इसका मेरी जिंदगी से कोई वास्ता नहीं है. लोग आए थे प्रपोजल लेकर कि जॉनी, आपका बायोपिक बनाते हैं, लेकिन मेरा ऐसा कोई शौक नहीं है. मैं इसलिए भी बचता हूं कि कहीं मजाक न बन जाए.जीते जी खुद का बायोपिक बनाना बेतुका है.मैंने देखा है कि सालों के बाद एक्टर को खुद से प्यार हो जाता है. ये खुद की फिल्म प्रोड्यूस भी करते हैं. हालांकि इसमें उनका नुकसान ही हुआ है.

आपके करियर में एक दौर ऐसा भी आया, जब 13 साल तक काम नहीं मिला?

अरे वो तो मत पूछो. मेरा डाउनफॉल पूरे 13 साल का रहा. मैंने इन तेरह साल में चार फिल्में कीं, वो भी घर चलाने की मजबूरी में बेबस होकर. उस दौरान मेरी बीवी परेशान हो गई थीं.वो कहती थीं कि तुमने कमा कर सारे पैसे चैरिटी और लोगों की मदद में बांट दिए और अब काम नहीं कर पा रहे हो, तो कोई मदद को नहीं आ रहा है. हालांकि मैंने किसी से मदद की उम्मीद रखी भी नहीं थी.

समय किसी को नहीं छोड़ता. उस वक्त किस्मत ऐसी पलटी थी कि शोज भी नहीं मिल रहे थे. हालांकि मैंने कभी खुद को कमजोर होने नहीं दिया. ऑप्शन भी नहीं था, क्योंकि मेरा परिवार मेरे सहारे बैठा था.उन दिनों खुद को बिजी रखने के लिए ऑस्कर विनिंग फिल्में देखा करता था. मूड लाइट करने के लिए अपनी कुछ अच्छी फिल्में भी देख लिया करता था. मैंने मंटो को पांच साल पढ़ा.

लेकिन सीखने से पेट नहीं भरता. पति और पिता के तौर पर फ्रस्ट्रेशन नहीं होता था?

सच कह रहा हूं, मुझे तकलीफ नहीं होती थी.बल्कि मेरी वाइफ काफी फ्रस्ट्रेट हो जाती थीं.मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब मैं लगातार काम किया करता था, तो तुम शिकायत करती थीं कि वक्त नहीं देता. मैं तुमसे कहता था कि अच्छा टाइम आएगा, तो जरूर वक्त दूंगा.जब 2010 से काम मिलना बंद हुआ, तो मैं घर पर ही रहा. मैंने उनसे कहा कि देखो, अच्छा टाइम आ गया है और मैं परिवार के साथ लंदन घूमने चला गया. यही अच्छा टाइम है, इसे इंजॉय करो.जो पैसे मेरे पास बचे थे, उसे मैंने खत्म कर दिया. फिर बीच में जो चार फिल्में मिली थीं, उसी से मेरे 13 साल गुजरे. उस वक्त जरूरत के हिसाब से ही खर्च करता था. फालतू खर्चे कम कर दिए थे. मैं शराब पीता था, लेकिन वो भी बंद कर दी थी.

एक वक्त था जब आप दिन में पांच फिल्मों की शूटिंग करते थे?

हम दिन में पांच फिल्में शूट किया करते थे. एक-एक प्रोड्यूसर को हम दो-दो घंटे का शेड्यूल दिया करते थे. रात में जब वक्त बचता, तो भी किसी न किसी फिल्म की डबिंग में जाता था.रात डबिंग स्टूडियो में गुजारकर हम फिर सीधा सेट पर जाते थे. कितने दिनों तक शहर में होते हुए भी मैं घर नहीं जा पाता था.

मजबूरी में फिल्में कीं, लेकिन क्या काम और फीस के साथ समझौता किया?

हां, लेकिन काम के साथ समझौता नहीं किया. पैसे के साथ भी समझौता नहीं किया.लोगों ने ताने भी मारे कि जॉनी, जो मिल रहा है रख लो, चला लो. मैं इसके सख्त खिलाफ था.लोगों ने यहां तक कहा कि मैं आउट हो जाऊंगा. जॉनी, आप कुछ भी फीस मांग रहे हैं, अपनी हालत तो देखो.आपका वक्त अच्छा नहीं है, तो मन की फीस मत मांगो.वैसे बता दूं,जिन्होंने मुझसे ये बातें कही थीं, वो अब इंडस्ट्री से आउट हो चुके हैं.मैंने 2014 में ‘गोलमाल’ से वापसी की और जितनी फीस थी मेरी, उससे डबल ही लिया था.

जॉनी लीवर की पहली फीस कितनी थी?

मेरी पहली फीस तो मुझे कभी मिली ही नहीं. 1979 में एक फिल्म की थी, उसके पैसे मिले ही नहीं.’दर्द का रिश्ता’ में मुझे प्रति दिन के हिसाब से 300 रुपये मिलते थे. फिर बढ़कर 500 हुआ. ‘बाजीगर’ फिल्म में मेरी फीस बढ़कर प्रति दिन 5 हजार हो गई.वहां से टर्निंग पॉइंट शुरू हुआ था. यह फिल्म केवल मेरे लिए नहीं, बल्कि शाहरुख खान और काजोल सबके लिए टर्निंग पॉइंट रही यहां से हम लोग फैल गए थे.

क्या आपके दौर की कॉमेडी का अंत हो गया है?

मेरे कितने सारे क्लिप से तो इंस्टाग्राम भरा पड़ा है. मैंने ये महसूस नहीं किया है. लोगों का प्यार मुझे मिलता रहता है. मेरी मीम्स मुझे ही भेजकर मेरी तारीफ करते हैं.

समय रैना और कुणाल कामरा जैसे स्टैंडअप कॉमेडियन्स पर आपकी राय?

स्टैंडअप कॉमेडी में समय, कामरा, जाकिर, टंडन की कॉमिक टाइमिंग अच्छी है. इनके शोज में कितनी ऑडियंस आती है. आज की जनरेशन इन्हें पसंद कर रही है.इन्होंने स्टैंडअप में एक्सपेरिमेंट किया है. हमारी अलग चीजें थीं, इनका तरीका अलग है. हम जो परफॉर्म करते हैं, इनसे डिफरेंट हैं.हालांकि हमारी जोक्स की डिटेल में जाकर ये लोग उसमें से ह्यूमर निकालते हैं. इतनी बारीकी से काम करना भी एक खूबी है. ये सभी अच्छा कर रहे हैं.

आज कॉमेडियन को जोक बोलने से पहले ज्यादा सोचना पड़ता है?

कब नहीं सोचना पड़ा? हमें भी सजग रहना पड़ता था. बहुत जिम्मेदारी के साथ काम करना पड़ता था.

आपको लगता है कोई कॉमेडियन अंडररेटेड रह गया?

आप जगदीप, महमूद, जॉनी वॉकर, असरानी साहब की कॉमेडी से वाकिफ जरूर रही होंगी. ये खतरनाक किस्म के कॉमेडियन थे. मेरा स्कूल वही है. मैंने उनको देखकर ही कॉमेडी सीखी है. मैं उन्हीं लोगों से आया हूं.आज के कॉमेडियन में कोई न कोई वॉइस वेरिएशन है और न ही वो वर्सेटिलिटी दिखती है. वो मेहनत भी दिखती नहीं.मैं किसी को एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी कहूं, वो बात मुझे किसी में दिखती ही नहीं. मैं चाहता हूं कि यहां हमारी लेगेसी को बढ़ाया जाए.

क्या अब फिल्मों में कॉमेडी सीन नहीं लिखे जाते?

‘बाजीगर’ में कॉमेडी राइटर था ही नहीं. पूरी कहानी मैंने खुद से इंप्रोवाइज की. 80 प्रतिशत वो मेरा क्रिएशन है. मैंने कितने कॉमेडी सीन्स लिखे हैं.तो कहने का मतलब यही है कि हमने मेहनत की है.लिखे तो जाते हैं, लेकिन अब लोग मेहनत नहीं करते.आपको खुद ही खुद को बचाना है. कोई नहीं आएगा. आपको राइटर से बात करनी होगी. आपको इंटरेस्ट दिखाना होगा. टेंशन लेनी होगी.सेट पर आकर अपना दिया काम कर चले जाएंगे, तो ग्रोथ की गुंजाइश कैसे होगी?अगर ऐसा होता है, तो इसके लिए आज की जनरेशन के एक्टर्स जिम्मेदार हैं.अरे सीन नहीं लिखे जाते थे, तो खुद से क्रिएट करो.’धमाल’ का सीन मैंने घर पर बैठकर बनाया है. डायरेक्टर को प्रपोज किया, तो उन्हें पसंद आया.कंप्लेन करने से कुछ नहीं होगा. खुद की जमीन तलाशनी होगी.

‘अब मजा आएगा न बीड़ू’ के पीछे क्या कहानी है?

अरे, वो तो मैंने ही क्रिएट किया है.’हेराफेरी’का सीन है.जीरो रीटेक पर शूट हुई है.अब तो GenZ को ध्यान में रखकर मैंने काम करना शुरू कर दिया है. अब सोचता हूं कि कुछ ऐसा बनाऊं, ताकि इन बच्चों के बीच कूल लग सकूं.

70 साल के जॉनी लीवर के पास आज भी काम करने की वही बेचैनी है. फर्क सिर्फ इतना है कि अब वह उस दौर में नहीं हैं, जब दिन में पांच फिल्मों के सेट पर भागना पड़ता था. लेकिन काम को लेकर उनका नजरिया आज भी वही है—शिकायत करने से कुछ नहीं होगा, अपनी जमीन खुद तलाशनी होगी.



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