
भारत के मानचित्र पर इंदौर एक ऐसा शहर है जो अपनी सामाजिकता, सामूहिकता और सामुदायिक भावना के लिए जाना जाता है।
बात पर्व-त्योहारों की करें तो इस शहर में त्योहार सिर्फ परिवार के साथ ही नहीं मनाई जाते बल्कि इनका एक भव्य सामूहिक स्वरूप यहां देखने को मिलता है।
गुड़ी पड़वा पर जहां घर घर पर गुड़ी पूजन होता है, वहीं अलसुबह राजवाड़े पर स्त्री- पुरुष, बच्चे सभी एकत्रित होकर सूर्य को अर्ध्य देते हैं और गुड-धनिया, नीम की चटनी, श्रीखंड का वितरण होता है। इस मिठास को लेकर शहरवासी घरों को लौट कर फिर परिवार में वर्ष का पहला दिन मानते हैं। ‘सानंद’ और उसके जैसी सांस्कृतिक संस्थाएं इस अवसर पर सुंदर, स्तरीय सांगीतिक कार्यक्रमों का आयोजन कर नव संवत्सर पर सबके साथ मिलकर आनंद को द्विगुणित करती हैं। ईद पर ईदगाह की रौनक बढ़ जाती है। रामनवमी और महावीर जयंती उत्सव पर सामूहिक पाठ और भजन- कीर्तन के लिए शहर के देवालयों में भक्त बड़ी संख्या में एकत्रित होते हैं।
गुड फ्राइडे पर चर्च में सामूहिक प्रार्थना होती है। अक्षय तृतीया पर सामूहिक विवाहों के साथ ही हल्दी-कुमकुम के भव्य आयोजन किए जाते हैं।
ईद या मोहर्रम के अवसर पर लगने वाले मेले बरबस ही ‘हमीद का चिमटा’ कहानी की याद दिला देते हैं। गुरु पूर्णिमा पर अपने गुरु को वंदन करने के लिए शिष्य मिल कर भक्ति भाव से कार्यक्रम आयोजित करते हैं।
स्वतंत्रता-दिवस और गणतंत्र-दिवस पर ध्वजारोहण और राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत कार्यक्रम, रीगल चौराहे पर क्रमिक कार्यक्रम शहर की फ़िजा में राष्ट्र-वंदना के सुर घोलकर संगठन शक्ति को बढ़ावा देते हैं।
कृष्ण जन्माष्टमी पर स्थान-स्थान पर दही हंडी के आयोजन देखने को मिलते हैं। हरितालिका और करवा चौथ जैसे पर्वों पर मिलकर पूजन करने की परिपाटी बढ़ती जा रही है। गणेश उत्सव और नवरात्रि के दौरान तो शहरवासियों का सामूहिकता बोध चरम पर होता है। दशहरे पर स्थान-स्थान पर बुराई के प्रतीक का दहन करने के लिए बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होते हैं। शरद पूर्णिमा की उजियारी रात पर स्थान-स्थान पर खीर के बड़े-बड़े भगोने चढ़ते हैं। दीपावली पर मिल कर बर्तन बाजार को नयनाभिराम तरीके से सजाना हो, गोवर्धन पूजा या सार्वजनिक आतिशबाजी हो, शहर मिलजुल कर दीप पर्व के आलोक को कई गुना बढ़ा देता है। गुरु नानक जयंती और महावीर जयंती पर निकलने वाले जुलूस समाज की संघ भावना का परिचायक हैं। ये आयोजन केवल समाज विशेष तक सीमित न रहकर विविधता में एकता, भाईचारा और सहयोग का दर्शन कराते हैं। बड़े दिन का त्योहार चर्च में सामूहिक रूप से संपन्न होता है। रंगपंचमी के अवसर पर इंदौर में निकलने वाली गेर के लिए तो लोग दूर-दूर से भी आते हैं। इस प्रकार वर्ष भर शहर में त्योहारों की धूम रहती है। इंदौर वासी त्योहारों को सिर्फ घरों में सिमट कर मनाना नहीं जानते बल्कि समाजजनों के साथ मिलजुलकर आनंद को कई गुना वृद्धिंगत करते हैं। इन अवसरों पर रक्तदान, भोजन, वस्त्र वितरण के द्वारा सेवाभाव और मानवीयता पोषित होती है।
जहां यह सामूहिकता समाज को एकता के सूत्र में बद्ध करती है, सामाजिक सौहार्द को बढ़ाती है, वहीं कभी-कभी इन अवसरों पर जातीय कलुष रंग में भंग करता है। जुलूस का और भंडारों का शहर कहे जाने वाले इस शहर में आए दिन बड़े-बड़े भंडारों का आयोजन होता है। यह विचारणीय बात है कि इन भंडारों से क्या वास्तव में अन्नदान का पुनीत कार्य होता है, क्या सिर्फ जरूरतमंदों की क्षुधापूर्ति होती है या अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा से प्रेरित होकर इस तरह के आयोजन होते हैं! क्या ही अच्छा हो, इस तरह के आयोजन में होने वाला व्यय समाज उत्थान के सार्थक कार्यों के लिए निवेश किया जाए। दीपावली या होली मिलन जैसे कार्यक्रमों में कालबाह्य हो चुकी परंपराओं को तिलांजलि देने, नई स्वस्थ परंपराओं को विकसित करने की बातें और उन पर अमल होना चाहिए।
मिलनसारिता और संघबद्धता के साथ त्योहार मनाने वाला यह शहर तब सच्चे अर्थों में नंबर वन हो सकेगा।
कुल मिलाकर बात यह है कि इंदौर में त्यौहार का उत्साह, ऊर्जा और उल्लास सांसर्गिक है।
बढ़ती व्यक्तिवादिता और आभासी माध्यमों के मकड़जाल में फंसती जा रही दुनिया में इंदौरियों का यह मेलमिलाप गर्व का विषय है।
वैजयंती दाते
170, लोकमान्य नगर, इंदौर
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