दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश- वकील की ₹78 लाख फीस दें:  कहा- कानूनी सेवाएं लेने के बाद फीस देने से मुकर नहीं सकती एमपी सरकार – Bhopal News

दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश- वकील की ₹78 लाख फीस दें: कहा- कानूनी सेवाएं लेने के बाद फीस देने से मुकर नहीं सकती एमपी सरकार – Bhopal News

दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश- वकील की ₹78 लाख फीस दें:  कहा- कानूनी सेवाएं लेने के बाद फीस देने से मुकर नहीं सकती एमपी सरकार – Bhopal News


राज्य सरकार किसी वरिष्ठ वकील से अदालत में अपनी पैरवी कराने के बाद उनकी फीस चुकाने से पल्ला नहीं झाड़ सकती। किसी वकील को अपने हक की फीस पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े, यह राज्य व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल है। दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस सचिन दत्ता की पीठ ने यह तल्ख टिप्पणी करते हुए मध्य प्रदेश सरकार को बड़ा झटका दिया है। हाईकोर्ट ने एमपी सरकार को राज्य के पूर्व महाधिवक्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप जॉर्ज चौधरी को ₹78.65 लाख का बकाया भुगतान 9% वार्षिक ब्याज (वर्ष 2021 से) के साथ करने का निर्देश दिया है। अदालत ने एमपी सरकार के रुख पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कानूनी सेवाएं लेने के बाद राज्य भुगतान से इनकार नहीं कर सकता। जस्टिस सचिन दत्ता ने टिप्पणी की कि किसी वकील को अपनी फीस वसूलने के लिए सालों तक याचिका लड़नी पड़े, यह व्यवस्था और राज्य की गरिमा के लिए चिंताजनक है। किस मामले में एमपी सरकार के वकील थे वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप जॉर्ज चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने मध्य प्रदेश सरकार और मध्य प्रदेश हाउसिंग बोर्ड का पक्ष रखा था। मामला इंदौर डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम मनोहर लाल (Indore Development Authority v. Manoharlal) और भूमि अधिग्रहण कानून (Land Acquisition Act, 2013) की धारा 24(2) की संवैधानिक व्याख्या से जुड़ा हुआ था। कब से पेंडिंग थी फीस और कितना था विवाद?
अक्टूबर 2019 से दिसंबर 2019 के बीच, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में राज्य का पक्ष रखते हुए 14 अलग-अलग तारीखों पर बहस की। इसके एवज में उन्होंने ₹1.76 करोड़ से अधिक के 35 बिल भेजे थे। वर्षों तक भुगतान न होने पर आखिरकार उन्हें 2021 में दिल्ली हाई कोर्ट की शरण में जाना पड़ा। यानी यह विवाद 2019 (पिछले 5-6 सालों) से लगातार अटका हुआ था। सरकार की दलील चौधरी की नियुक्ति की अधिकारिक फाइल उपलब्ध नहीं
सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश सरकार ने दलील दी कि चौधरी की नियुक्ति की कोई आधिकारिक फाइल उपलब्ध नहीं है और उनकी फीस का दावा बहुत अधिक है। इस पर दिल्ली हाई कोर्ट ने फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक कॉज़ लिस्ट (Cause List) और राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव (एसआर मोहंती) के बयानों को रिकॉर्ड पर लिया। कोर्ट ने साफ कहा कि जब राज्य ने चौधरी को सुप्रीम कोर्ट में खड़ा किया और उनकी बहस का फायदा उठाया, तो अब रिकॉर्ड का बहाना बनाकर पैसे देने से मना नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने तकनीकी और दोहरी बिलिंग को हटाते हुए ₹6.05 लाख प्रति सुनवाई के हिसाब से 13 दिनों की फीस यानी कुल ₹78,65,000 की राशि तुरंत 9 फीसदी ब्याज के साथ चुकता करने का फरमान जारी कर दिया।

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