बांग्लादेश ने रणनीतिक रूप से अहम मोंगला बंदरगाह चीन को सौंपने का फैसला किया है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के चीन दौरे पर इसे लेकर समझौता भी हो गया है। यह समझौता ढाका और बीजिंग के रणनीतिक और आर्थिक संबंधों में आ रहे महत्वपूर्ण बदलावों को दिखाता है। समझौते के तहत चीन की सरकारी कंपनी, मोंगला बंदरगाह को विकसित करेगी। साथ ही इस प्रोजेक्ट के तहत चीन बागेरहाट में मोंगला बंदरगाह के करीब 110 एकड़ भूमि को भी आर्थिक जोन के रूप में विकसित करेगा, जहां इलेक्ट्रोनिक्स कंपनियां बनेंगी।
बांग्लादेश ने भारत से छीनकर चीन को सौंपा प्रोजेक्ट
मोंगला बंदरगाह को विकसित करने की जिम्मेदारी पहले भारत को मिली थी और साल 2015 में इसे लेकर तत्कालीन शेख हसीना सरकार और भारत के बीच एक करार भी हुआ था। साल 2018 में भारत सरकार ने हीरानंदानी ग्रुप को मोंगला बंदरगाह को विकसित करने का ठेका दिया। हालांकि अगस्त 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार का तख्ता पलट हो गया और आश्चर्यजनक तौर पर अक्तूबर 2024 में ही तत्कालीन मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार ने भारत के साथ समझौता रद्द कर दिया। अब उसी प्रोजेक्ट को बांग्लादेश ने चीन को सौंप दिया है।
मोंगला बंदरगाह पर चीन की मौजूदगी भारत के लिए खतरा क्यों?
मोंगला बंदरगाह पर चीन की मौजूदगी उसकी हिंद महासागर में रणनीतिक मौजूदगी को और विस्तार दे सकती है। चीन पहले से ही पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह और श्रीलंका के हंबनटोटा और पूर्वी अफ्रीका के जिबूती के बंदरगाहों के जरिए पहले ही भारत को घेरने की रणनीतिक पर काम कर रहा है। अब मोंगला बंदरगाह, जो बांग्लादेश का दूसरा सबसे व्यस्त बंदरगाह है, वहां चीन की मौजूदगी भारत के लिए चिंताजनक इसलिए भी है, क्योंकि इसकी दूरी भारत की जल सीमा से सिर्फ 130 किलोमीटर और जमीन से 80 किलोमीटर दूर ही है। चीन अगर मोंगला पोर्ट पर अपना नौसैनिक बेस बनाता है तो यहां से भारत पर निगरानी करना बेहद आसान हो जाएगा।
इतना ही नहीं चीन को घेरने के लिए भारत मलक्का जलडमरूमध्य को नियंत्रित करने की क्षमता विकसित करता है तो भी मोंगला पोर्ट चीन के लिए बेहद अहम है और यहां से चीन भारत की मलक्का जलडमरूमध्य को नियंत्रित करने की क्षमता को बुरी तरह से प्रभावित कर सकता है।