भारत में बच्चों में तेजी से बढ़ता टाइप-1 डायबिटीज यानी बाल मधुमेह अब एक गंभीर राष्ट्रीय स्वास्थ्य चुनौती का रूप ले चुका है। मौजूदा समय में भारत में लगभग 9.9 लाख बच्चे इस खतरनाक बीमारी से प्रभावित हैं। यह बात राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात मधुमेह शोधकर्ता डॉ. रविंद्र नांदेडकर ने इंदौर में कही। उन्होंने देश में बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर कई जरूरी जानकारियां दी। वे यहां पर अनुयश आरोग्य प्रतिष्ठान एवं मधुमेह मुक्त भारत अभियान के तत्वावधान में आयोजित एक कार्यक्रम में आए। डॉक्टर नांदेडकर का मानना है कि यदि समय पर इस बीमारी की पहचान कर ली जाए, व्यापक स्तर पर जनजागरूकता फैलाई जाए और सामाजिक सहयोग मिले, तो देश के हजारों बच्चों का भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है।
बीमारी की भयावहता बताकर चेताया
डॉक्टर नांदेडकर ने टाइप-1 डायबिटीज इंडेक्स के आंकड़ों का हवाला देते हुए एक चिंताजनक हकीकत सामने रखी। उन्होंने बताया कि मौजूदा समय में भारत में लगभग 9.9 लाख बच्चे इस खतरनाक बीमारी से प्रभावित हैं। उन्होंने इस बीमारी की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए कहा कि टाइप-1 डायबिटीज मूल रूप से एक ऑटो-इम्यून रोग है। इस बीमारी की स्थिति में मरीज के शरीर का अग्न्याशय पूरी तरह से इंसुलिन बनाना बंद कर देता है। इंसुलिन न बनने के कारण ऐसे पीड़ित बच्चों को जीवनभर कृत्रिम इंसुलिन के सहारे रहना पड़ता है और उन्हें लगातार विशेषज्ञ मार्गदर्शन की अत्यंत आवश्यकता होती है।
बाल मधुमेही दत्तक योजना से मिल रही बड़ी राहत
इस गंभीर चुनौती से निपटने और पीड़ित बच्चों की मदद के लिए अनुयश आरोग्य प्रतिष्ठान द्वारा देशव्यापी स्तर पर बाल मधुमेही दत्तक योजना चलाई जा रही है। इस विशेष योजना के अंतर्गत 18 वर्ष तक की आयु के बच्चों का 100 प्रतिशत नि:शुल्क पंजीकरण किया जाता है। इसके साथ ही संस्थान की ओर से बच्चों को उचित चिकित्सकीय मार्गदर्शन और उनके द्वारा विशेष रूप से विकसित की गई हर्बल औषधि डायबा-टी पूरी तरह से मुफ्त उपलब्ध कराई जाती है। आंकड़ों के अनुसार अब तक देश के 2,000 से अधिक बच्चे इस कल्याणकारी योजना का प्रत्यक्ष लाभ उठा चुके हैं। इस महत्वपूर्ण अवसर पर हर्बायू वेलनेस इंडिया के सीओओ विजय निंबालकर और राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रचारक विशाल खानवलकर भी मौजूद रहे, जिन्होंने समाज के सभी वर्गों से इस अभियान में बढ़-चढ़कर सहयोग करने की अपील की।