युवा निर्देशक रिंकू शर्मा द्वारा निर्देशित फिल्म हमारी रामलीला को दर्शकों और समीक्षकों के बीच काफी लोकप्रियता मिल रही है। यह फिल्म मुख्य रूप से उन कलाकारों के कड़े संघर्ष और अटूट मेहनत पर आधारित है, जिनकी बदौलत आज भी देश के गांवों, कस्बों और छोटे-छोटे शहरों में रामलीला की समृद्ध परंपरा जीवंत बनी हुई है। फिल्म में बेहद खूबसूरती से दिखाया गया है कि तमाम विपरीत परिस्थितियों, आर्थिक तंगहाली और नाम-शौहरत की चाह के बिना भी ये कलाकार किस तरह इस सांस्कृतिक विरासत को सहेजने में जुटे हुए हैं।
साधनों के अभाव में कला का सफर
निर्देशक रिंकू शर्मा ने फिल्म निर्माण के अपने अनुभवों को अमर उजाला के साथ साझा करते हुए बताया कि आज के दौर में नए निर्देशकों के लिए फिल्म बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण काम है। इस फिल्म को पूरा करने के लिए उन्हें अपने दोस्तों से कर्ज तक लेना पड़ा था। वे एक निजी कंपनी में नौकरी करने के साथ-साथ इस फिल्म के निर्माण कार्य में लगे रहे। जब फिल्म पूरी तरह बनकर तैयार हो गई, तब उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। रिंकू शर्मा के इस कड़े संघर्ष का परिणाम आज सबके सामने है और इस फिल्म को कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शित करने का अवसर मिला है, जहां इसे भरपूर सराहना मिल रही है।
सामूहिक प्रयास से बनी फिल्म
निर्देशक के अनुसार हमारी रामलीला दिल्ली की एक आम रिहायशी कॉलोनी में स्थानीय समाज द्वारा आयोजित की जाने वाली रामलीला के मंचन की कहानी को सामने लाती है। यह फिल्म उस अनौपचारिक मेहनत और सामूहिक प्रयासों को रेखांकित करती है, जो आज के आधुनिक युग में भी इस प्राचीन परंपरा को कायम रखे हुए हैं। फिल्ममेकिंग की अपनी अनूठी शैली के बारे में बात करते हुए शर्मा ने बताया कि उनका तरीका लंबे समय तक किए गए फील्ड ऑब्जर्वेशन और डॉक्यूमेंट्री स्टोरीटेलिंग पर आधारित है। उनका मुख्य ध्यान आम लोगों के समुदाय और सांस्कृतिक निरंतरता को प्रभावित करने वाली सामाजिक स्थितियों पर रहता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली बड़ी पहचान
इस स्वतंत्र वृत्तचित्र फिल्म ने वैश्विक स्तर पर देश का नाम रोशन किया है। फिल्म ने जनकपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल नेपाल में प्रतिष्ठित पुरस्कार अपने नाम किया है। इसके साथ ही इस फिल्म को फिप्रेस्की-इंडिया ग्रैंड प्रिक्स 2024 के लिए नामांकित किया गया था और शिमला इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के लिए भी इसका आधिकारिक तौर पर चयन किया गया है। यह फिल्म नवरात्रि के पावन त्योहार के दौरान अलग-अलग पृष्ठभूमि से आने वाले आम लोगों के आपसी तालमेल, उनकी चुनौतियों और साथ मिलकर खुशियां मनाने के जज्बे को प्रदर्शित करती है।
सांस्कृतिक शिक्षा देती है फिल्म
तकनीकी रूप से हमारी रामलीला एक फीचर-लेंथ एथनोग्राफिक डॉक्यूमेंट्री है जो रामलीला को केवल एक नाटक या थिएटर परफ़ॉर्मेंस के रूप में नहीं देखती, बल्कि इसे सामूहिक यादों, जन-भागीदारी और मौखिक रूप से आगे बढ़ने वाली एक जीवंत सांस्कृतिक शिक्षा प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है। रोजमर्रा के सामुदायिक जीवन पर आधारित यह फिल्म दर्शाती है कि रामलीला किस प्रकार एक साझा सामाजिक प्रक्रिया के रूप में काम करती है, जहां मिथक, अटूट विश्वास, अभिनय और स्थानीय इतिहास मिलकर एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को आकार देते हैं।
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