गुरिंदरवीर सिंह कौन हैं, जो बन गए हैं भारत के सबसे तेज़ धावक

गुरिंदरवीर सिंह कौन हैं, जो बन गए हैं भारत के सबसे तेज़ धावक

गुरिंदरवीर सिंह भारत के सबसे तेज़ धावक बन गए हैं

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पढ़ने का समय: 8 मिनट

बंदा सच में फास्ट है…

नाम है गुरिंदरवीर सिंह

इवेंट 100 मीटर दौड़

टाइम 10.09 सेकंड

शनिवार को गुरिंदरवीर सिंह ने ऐसी उपलब्धि हासिल की, जो अब तक कोई भारतीय हासिल नहीं कर सका था. उन्होंने 100 मीटर की दौड़ 10.09 सेकंड में पूरी की.

भारत के इतिहास के सबसे तेज़ धावक

गुरिंदरवीर सिंह

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इमेज कैप्शन, गुरिंदरवीर सिंह का कहना है कि वो ये मिथक तोड़ना चाहते हैं कि भारतीयों में तेज धावक बनने के जींस नहीं हैं

तक़रीबन एक साल पहले अनिमेष कुजूर ने गुरिंदरवीर का तब का राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ते हुए 10.18 सेकंड का समय निकाला था, तो इसे करिश्मा कहा गया था.

अनिमेष ग्रीस के वारी शहर में आयोजित ड्रोमिया इंटरनेशनल स्प्रिंट मीट में भले ही तीसरे नंबर पर रहे थे, लेकिन उन्होंने जो कीर्तिमान रचा था, उसने उन्हें सबसे तेज़ भारतीय होने का गौरव दिला दिया था.

इस समय पर एक बार फिर ग़ौर कीजिए… 10.09 सेकंड.

रांची के बिरसा मुंडा एथलेटिक्स स्टेडियम में शनिवार को गुरिंदरवीर सिंह ने न केवल नया राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया, बल्कि 10.0 सेकंड के दायरे में 100 मीटर दौड़ पूरी करने वाले वह पहले भारतीय भी बन गए.

दरअसल, बिरसा मुंडा स्टेडियम में पिछले दो दिनों में ऐसा कुछ हुआ जो रेसिंग के दीवानों के लिए बेहद रोमांचक था.

शुक्रवार को गुरिंदरवीर ने सेमीफ़ाइनल में 10.17 सेकंड में 100 मीटर की दौड़ पूरी कर अनिमेष का रिकॉर्ड तोड़ा, लेकिन उनका ये रिकॉर्ड 10 मिनट से ज़्यादा नहीं टिक सका और छत्तीसगढ़ के रिकॉर्डधारी अनिमेष ने दूसरे सेमीफ़ाइनल में 10.15 सेकंड में रेस पूरी कर रिकॉर्ड एक बार फिर अपने नाम कर लिया.

अगले दिन दोनों दिग्गज गुरिंदरवीर और अनिमेष फिर ट्रैक पर थे और जैसी की उम्मीद थी, कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी. भारतीय एथलेटिक्स के इतिहास में एक और अध्याय लिखा जाना बाकी था.

गुरिंदरवीर सिंह ने रेस की शुरुआत से ऐसी रफ़्तार पकड़ी कि अनिमेष समेत दूसरे प्रतिद्वंद्वियों के लिए उन्हें पकड़ना नामुमकिन हो गया.

गुरिंदरवीर सिंह ने फिनिश लाइन तक अपनी रफ़्तार बरकरार रखी और अनिमेष से 0.11 सेकंड आगे रहते हुए रेस जीत ली. अनिमेष 10.20 सेकंड के साथ दूसरे नंबर पर रहे.

फिनिश लाइन पार करते ही उन्होंने अपनी जर्सी से बिब नंबर फाड़कर ट्रैक पर फेंक दिया और ज़ोरदार गर्जना की.

इस बिब पर एक संदेश भी था, जिसमें लिखा था, ‘टास्क इज़ नॉट फिनिश्ड यट, वेट आई एम स्टिल स्टैंडिंग (काम अभी पूरा नहीं हुआ है, इंतज़ार करो मैं अब भी खड़ा हूँ.)’

बाद में समाचार एजेंसी पीटीआई से बात करते हुए गुरिंदरवीर सिंह ने कहा, “मेरे कोच ने मेरे साथ कड़ी मेहनत की और मुझे गहन प्रशिक्षण दिया. मुझे मौका देने के लिए मैं रिलायंस फाउंडेशन का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ. साथ ही मैं सहयोग देने के लिए अपने परिवार को भी धन्यवाद देना चाहता हूँ.”

अनिमेष के साथ प्रतिद्वंद्विता के बारे में उन्होंने कहा, “बहुत अच्छा है. ये होना चाहिए. जब तक प्रतिद्वंद्विता नहीं होगी, तब तक लोगों को मज़ा नहीं आएगा. अनिमेष का शुक्रिया कि वो फुटबॉल छोड़कर एथलेटिक्स में आया.”

उन्होंने कहा, “हम एक-दूसरे को आगे बढ़ाते हैं, अगर वह तेज़ दौड़ता है, तो मैं उससे तेज़ दौड़ना चाहता हूं.”

एथलेटिक्स को करियर बनाने के बारे में पूछे गये सवाल पर गुरिंदरवीर ने कहा, “जब मैं छठी-सातवीं में पढ़ता था तब से लोग मुझे कहते थे कि 100 मीटर में कोई भविष्य नहीं है. भारतीय 100 मीटर नहीं भाग सकते. स्प्रिंट के लिए इंडियन जींस नहीं हैं. उन्हें गलत साबित करना है कि इंडियन जींस में बहुत दम है.”

कौन हैं धावक गुरिंदरवीर सिंह

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इमेज कैप्शन, कोच सरबजीत सिंह हैप्पी से ट्रेनिंग लेने के बाद गुरिंदरवीर सिंह की ज़िंदगी बदल गई

बीबीसी संवाददाता हरपिंदर सिंह तोहड़ा के मुताबिक गुरिंदरवीर सिंह पंजाब के जालंधर ज़िले के पटियाल (पटियाला) गांव के रहने वाले हैं. उन्होंने छठी कक्षा से ही एथलेटिक्स की शुरुआत कर दी थी.

गुरिंदरवीर को एथलेटिक्स में लाने का श्रेय उनके पिता कमलजीत सिंह को जाता है, जो पंजाब पुलिस में एएसआई हैं.

कमलजीत सिंह खुद भी वॉलीबॉल खिलाड़ी रह चुके हैं.

नौवीं क्लास में पहुंचने पर गुरिंदरवीर सिंह ने कोच सरवन सिंह से ट्रेनिंग लेनी शुरू की.

नौवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद वो जालंधर चले गए और वहां कोच सरबजीत सिंह हैप्पी से कोचिंग ली.

सरबजीत सिंह हैप्पी से कोचिंग के बाद गुरिंदरवीर सिंह की ज़िंदगी बदल गई.

उनसे कोचिंग लेने के बाद गुरिंदरवीर सिंह ने कई टूर्नामेंट्स में मेडल जीते.

कोच सरबजीत सिंह ने बीबीसी से कहा, “मैंने पहले ही दिन उनके पिता से कह दिया था कि शुरुआती तीन-चार साल किसी नतीज़े की उम्मीद न रखें, क्योंकि शुरुआती समय में खिलाड़ी की नींव तैयार होती है, उसके बाद ही परिणाम आते हैं.”

गुरिंदरवीर ने किन प्रतियोगिताओं में पदक जीते?

गुरिंदरवीर सिंह

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इमेज कैप्शन, गुरिंदरवीर सिंह यूथ एशिया, जूनियर एशिया, जूनियर सैफ और यूरो एशिया प्रतियोगिताओं गोल्ड मेडल जीत चुके हैं

कोच सरबजीत सिंह के मुताबिक़ गुरिंदरवीर अपने खेल को लेकर बेहद जुनूनी हैं और मेहनत पर भरोसा करते हैं.

उन्होंने अंडर-18 एथलेटिक्स में राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया. इसके बाद अंडर-19 एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीता.

अंडर-20 में गुरिंदरवीर ने 100 मीटर दौड़ 10.35 सेकंड में पूरी कर राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया.

उन्होंने यूथ एशिया, जूनियर एशिया, जूनियर सैफ और यूरो एशिया प्रतियोगिताओं में भी गोल्ड मेडल जीता.

सैफ़ सीनियर गेम्स की रिले रेस में उन्होंने मेडल हासिल किए.

कोच सरबजीत सिंह बताते हैं कि कोरोना काल के दौरान उन्हें चिंता थी कि अभ्यास कैसे जारी रहेगा, लेकिन मुश्किल हालात में भी गुरिंदरवीर ने ट्रेनिंग नहीं छोड़ी.

कोरोना के बाद 2021 में पटियाला में आयोजित एक मीट में उन्होंने 100 मीटर दौड़ 10.27 सेकंड में पूरी की. उस समय वे राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ने से सिर्फ़ एक माइक्रो सेकंड दूर रह गए थे.

हालांकि उत्तराखंड में हुए नेशनल गेम्स में उनका प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा और वे फ़ाइनल में जगह नहीं बना सके.

उन्होंने हीट्स में 10.96 सेकंड का समय लेकर तीसरा स्थान हासिल किया.

गुरिंदरवीर ने पंजाब क्यों छोड़ा?

गुरिंदरवीर सिंह

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इमेज कैप्शन, गुरिंदरवीर सिंह पंजाब छोड़कर मुंबई में रहते हैं. उनका कहना है कि रिलायंस फाउंडेशन से जुड़ने की वजह से उन्हें काफ़ी सुविधाएं मिल रही हैं

कोच सरबजीत सिंह के मुताबिक़ कुछ महीने पहले गुरिंदरवीर को रिलायंस फ़ाउंडेशन ने अपने साथ जोड़ लिया.

कोच का कहना है कि पंजाब और मुंबई की सुविधाओं में बड़ा अंतर है. मुंबई में खिलाड़ियों को आधुनिक ट्रेनिंग और बेहतर सुविधाएं मिलती हैं,

इसलिए गुरिंदरवीर को वहां भेजने का फैसला लिया गया.

उन्होंने कहा, “पंजाब में खिलाड़ी को सिर्फ कोच मिलता है, लेकिन सहायक कोच और पूरी डाइट जैसी सुविधाएं नहीं हैं.”

सरबजीत सिंह बताते हैं कि जब जालंधर में सिंथेटिक ट्रैक नहीं था, तब गुरिंदरवीर और दूसरे खिलाड़ी अभ्यास के लिए कई किलोमीटर दूर तरनतारन जाया करते थे.

पंजाब की सुविधाओं पर क्या बोले थे गुरिंदरवीर?

गुरिंदरवीर ने पिछले दिनों कहा था, “पंजाब छोड़कर मुंबई में रिलायंस फाउंडेशन से जुड़ने का मुख्य कारण बेहतर सुविधाएं थीं. पंजाब में हमें रोज़ सिर्फ 160 रुपये की डाइट मिलती थी और वह भी कई बार नहीं मिलती थी.”

उन्होंने कहा था, “कई दिनों तक भूखा रहना पड़ता था और बाहर खाना खाना पड़ता था, जिससे मेरी तबीयत भी खराब हो गई थी. ठीक होने में करीब डेढ़ साल लग गया. रिलायंस फाउंडेशन में करीब 2000 रुपये रोज़ की डाइट और हर तरह की सुविधा मिलती है.”

गुरिंदरवीर अपने पिता और कोच को अपना आदर्श मानते हैं. उनका कहना है कि दोनों ने हर कदम पर उनका साथ दिया. वे सिख धर्म के शहीदों से भी प्रेरणा लेते हैं.

‘ फ़्लाइंग सिख’ कहे जाने पर क्या बोले?

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इमेज कैप्शन, गुरिंदरवीर सिंह का कहना है कि उनका लक्ष्य ओलंपिक में मेडल जीतना है

सोशल मीडिया पर गुरिंदरवीर को उनकी तेज़ रफ्तार के कारण “फ्लाइंग सिख” कहा जा रहा है और उनकी तुलना मिल्खा से की जा रही है.

इस पर गुरिंदरवीर ने कहा, “मुझे खुशी होती है कि लोग मुझे फ्लाइंग सिख कह रहे हैं और मेरी तुलना मिल्खा सिंह जैसे महान खिलाड़ी से कर रहे हैं, जिन्होंने एथलेटिक्स में अलग पहचान बनाई.”

हालांकि उनके कोच सरबजीत सिंह कहते हैं कि मिल्खा सिंह का इवेंट अलग था, लेकिन लोगों का इस तरह प्यार देना गर्व की बात है.

कोच सरबजीत सिंह बताते हैं कि कई लोगों ने गुरिंदरवीर से कहा था कि 100 मीटर दौड़ उत्तर भारत के खिलाड़ियों का खेल नहीं है और इसमें दक्षिण भारतीय खिलाड़ी ही सफल होते हैं.

लेकिन गुरिंदरवीर ने अपनी मेहनत और लगन से इस धारणा को गलत साबित कर दिया. उन्होंने न सिर्फ यह मिथक तोड़ा, बल्कि आने वाली पीढ़ी के खिलाड़ियों के लिए मिसाल भी कायम की.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित

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