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देशभर में इथेनॉल मिश्रित ई20 पेट्रोल को लेकर चल रही बहस के बीच छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के ज़िला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक अहम फ़ैसला सुनाया है.
एक उपभोक्ता की शिकायत के बाद आयोग ने मारुति सुज़ुकी इंडिया लिमिटेड को निर्देश दिया है कि वह 45 दिनों के भीतर उसी मॉडल की नई ई20 फ़्यूल पावर्ड कार शिकायतकर्ता को उपलब्ध कराए.
अगर कंपनी ऐसा करने में विफल रहती है, तो उसे वाहन की पूरी क़ीमत समेत कुल 20 लाख 50 हज़ार 494 रुपये लौटाने होंगे.
इसके अलावा आयोग ने मानसिक प्रताड़ना के लिए एक लाख रुपये और मुक़दमे के ख़र्च के रूप में 10 हज़ार रुपये देने का भी आदेश दिया है.
लेकिन जिस मारुति सुज़ुकी डीलरशिप से यह कार ख़रीदी गई थी, उसने आयोग के सामने दलील दी कि शिकायतकर्ता के वाहन में आई ख़राबी बाहरी कारकों के कारण हुई थी, जो किसी भी स्थिति में वॉरंटी के अंतर्गत नहीं आती.
कहां से हुई विवाद की शुरुआत
यह मामला रायपुर निवासी डॉक्टर प्रेमराज देब्ता का है. उन्होंने जून 2024 में मारुति कंपनी की ग्रैंड विटारा आईईई स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड जेटा प्लस एसयूवी ख़रीदी थी. हालांकि, यह वाहन जनवरी 2023 में निर्मित हुआ था.
वाहन में बार-बार तकनीकी ख़राबी आने के बाद उन्होंने रायपुर के ज़िला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी.
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डॉक्टर प्रेमराज देब्ता ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी को बताया, “एक शाम जब मैं अपने क्लिनिक से निकल रहा था, तभी मेरी गाड़ी अचानक बंद हो गई. उसे कंपनी के सर्विस सेंटर ले जाया गया, जहां बताया गया कि पेट्रोल में मिलावट है. ऐसा कई बार हुआ. बाद में हमने सरकारी प्रयोगशाला में जांच कराई, तो पता चला कि सफ़ेद दही जैसा जमा हुआ पदार्थ वास्तव में इथेनॉल था.”
देब्ता का दावा है कि “जांच रिपोर्ट के आधार पर जब डीलरशिप से शिकायत की गई, तो डीलरशिप ने यह कहते हुए ज़िम्मेदारी लेने से इनकार किया कि ख़राबी इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के कारण हुई है.”
इसके बाद उन्होंने उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई.
शिकायतकर्ता का आरोप था कि वाहन ख़रीदते समय उन्हें यह नहीं बताया गया कि कार का इंजन ई20 पेट्रोल के लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं है. उनका कहना था कि अगर वाहन ई20 ईंधन के लिए सक्षम नहीं था या उसके उपयोग को लेकर कोई विशेष सावधानी बरतना आवश्यक था, तो इसकी स्पष्ट जानकारी बिक्री के समय दी जानी चाहिए थी.
इस मामले में वाहन विक्रेता नेक्सा मैग्नेटो स्काई ऑटोमोबाइल्स और वाहन निर्माता मारुति सुज़ुकी इंडिया लिमिटेड को पक्षकार बनाया गया.
सभी पक्षों की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद ज़िला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने अपने आदेश में कहा कि डॉक्टर प्रेमराज देब्ता ने 3 जून 2024 को जो वाहन ख़रीदा था, उसका इंजन 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ई20) पर चलने के लिए उपयुक्त नहीं था.
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आयोग ने यह भी माना कि वाहन जनवरी 2023 में निर्मित हुआ था और उसका इंजन ई20 पेट्रोल पावर्ड नहीं था.
आयोग ने अपने आदेश में कहा कि शिकायतकर्ता ने बार-बार ईंधन बदलकर, पेट्रोल टैंक की सफ़ाई कराकर और नया पेट्रोल डलवाकर वाहन को चलाने का प्रयास किया, लेकिन इसके बावजूद कार बार-बार बंद होती रही. लगातार तकनीकी ख़राबी के कारण वाहन को कई बार सर्विस सेंटर ले जाना पड़ा.
आयोग ने अपने फ़ैसले में यह भी कहा कि आधुनिक वाहनों में ईंधन की गुणवत्ता और उसकी अनुकूलता एक अहम विषय है. अगर निर्माता या विक्रेता उपभोक्ता को वाहन की ईंधन अनुकूलता और उससे जुड़े आवश्यक तथ्यों की स्पष्ट जानकारी देने में विफल रहते हैं और बाद में उसी कारण वाहन में तकनीकी ख़राबी आती है, तो इसे सेवा में कमी माना जाएगा.
आयोग ने मारुति सुज़ुकी को निर्देश दिया कि वह 45 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता की ख़राब कार वापस लेकर उसी मॉडल की नई ई20 फ़्यूल पावर्ड कार उपलब्ध कराए.
अगर कंपनी ऐसा नहीं करती है, तो उसे वाहन की क़ीमत 18.29 लाख रुपये, आरटीओ शुल्क 1,86,850 रुपये और बीमा प्रीमियम 34,644 रुपये, यानी कुल 20,50,494 रुपये लौटाने होंगे.
इसके साथ ही मानसिक क्षति के लिए एक लाख रुपये तथा वाद-व्यय के रूप में 10 हज़ार रुपये का भुगतान भी करना होगा.
कार विक्रेता की दलील
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इस संबंध में कार विक्रेता नेक्सा मैग्नेटो स्काई ऑटोमोबाइल्स के प्रबंधक ने अदालत में प्रस्तुत अपने जवाब में कहा कि “वाहन में समस्या पेट्रोल के कारण हुई और उसकी जांच भी कराई गई.”
“हर बार टंकी साफ़ करवाई गई, लेकिन हर बार पेट्रोल में गड़बड़ी पाई गई.”
मैनेजर की दलील थी कि शिकायतकर्ता के वाहन में आई ख़राबी बाहरी कारकों के कारण हुई थी, जो किसी भी स्थिति में वॉरंटी के अंतर्गत नहीं आती.
उनका कहना था कि वॉरंटी नीति के अनुसार बाहरी कारकों के कारण अगर वाहन में ख़राबी आती है, तो वह वॉरंटी के अंतर्गत नहीं आती.
अपनी सफ़ाई में कंपनी के मैनेजर ने कहा कि शिकायतकर्ता के वाहन के ईंधन का नमूना लेकर उसे स्वतंत्र सरकारी मान्यता प्राप्त एसजीएस प्रयोगशाला में भेजा गया था, जिसमें पाया गया कि ईंधन की गुणवत्ता उचित नहीं है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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