तीन पीढ़ियों तक दिख सकता है कठोर पैरेंटिंग का असर:किशोरों से आज की कड़वाहट बुढ़ापे में नाती-पोतों से कर देती है दूर, 37 साल चली स्टडी में दावा

तीन पीढ़ियों तक दिख सकता है कठोर पैरेंटिंग का असर:किशोरों से आज की कड़वाहट बुढ़ापे में नाती-पोतों से कर देती है दूर, 37 साल चली स्टडी में दावा




पैरेंट्स… ​किशोर होते बच्चों को अक्सर डांटते-फटकारते रहते हैं तो सजग हो जाइए। अक्सर इस तकरार को ‘एक फेज’ मानकर टाल दिया जाता है। पर नई स्टडी कहती है कि यह तनाव जल्दी खत्म नहीं होता। इसका असर दशकों तक या कहें- पी​ढ़ियों तक रह सकता है। आयोवा यूनिवर्सिटी की स्टडी के अनुसार किशोरों से बरसों पहले कही गई तीखी बातें, गुस्से से भरा लहजा, दशकों बाद भी पारिवारिक रिश्तों के ताने-बाने को बदल सकता है। यानी किशोरावस्था की कड़वी बातें, वहीं वहीं दफन नहीं होतीं।’ स्टडी की प्रमुख शोधकर्ता, प्रो. ट्रिशिया नेपल कहती हैं,‘किशोरावस्था में कठोर पैरेंटिंग मजबूत जुड़ाव नहीं बनने देती। पहले माता-पिता और बड़े हो चुके बच्चों के बीच फिर दादा-दादी और पोते-पोतियों के बीच। यह निष्कर्ष 1989 से 2026 तक जारी यूनिवर्सिटी के ‘फैमिली ट्रांजिशंस प्रोजेक्ट’ से निकला। शोधकर्ताओं ने इस दौरान 550 परिवारों की बातचीत के तरीकों को वीडियो कैमरों में रिकॉर्ड किया था। स्वतंत्र समीक्षकों अलग-अलग बिंदुओं पर पैरेंट्स के व्यवहार को परखा था-जैसे उनका चिड़चिड़ापन, गुस्से में नियंत्रण की कोशिश या उदासीन प्रतिक्रिया। उन्होंने देखा कि जिन पैरेंट्स का रवैया 16 साल के बच्चों के प्रति कड़ा था, उन बच्चों ने वयस्क होने पर (20वें वर्ष के आखिरी पड़ाव में) पैरेंट्स से भावनात्मक दूरी बना ली।ट्रि​​शिया कहती हैं, ‘जब वे किशोर आगे चलकर खुद माता-पिता बने, तो उनके अभिभावक, जो अब दादा-दादी थे, अपने 2020 के बाद जन्मे पोते-पोतियों से करीबी रिश्ता नहीं बना सके। स्टडी नहीं, यह गंभीर चेतावनी, सजग हो जाएं ​​ट्रि​शिया के मुताबिक आज के दौर में, जहां दादा-दादी बच्चों की परवरिश, सुरक्षा उन्हें भावनात्मक संबल देने में अहम भूमिका निभा रहे हैं, यह स्टडी गंभीर चेतावनी है। किशोरावस्था के मुश्किल दौर में गुस्से को काबू करना और संवाद का लहजा नर्म रखना सिर्फ आज का विवाद नहीं सुलझाता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के बीच अपनेपन की मजबूत नींव भी रखता है। वे कहती हैं,‘परिवार बदल सकते हैं, बशर्ते शुरुआती €दखल प्रभावी हो। इसे अलावा विवाद प्रबंधन, भावनाओं पर नियंत्रण और बेहतर संवाद सिखाने वाले कार्यक्रम भी इसमें मदद कर सकते हैं।’



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