पति से अलग रह रही महिला गर्भ जारी नहीं रखना चाहती, तो सहमति जरूरी नहीं, हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने सुनाया महत्वपूर्ण फैसला

पति से अलग रह रही महिला गर्भ जारी नहीं रखना चाहती, तो सहमति जरूरी नहीं, हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने सुनाया महत्वपूर्ण फैसला

अदालत ने अपने आदेश में यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई महिला अपनी गर्भावस्था को जारी नहीं रखना चाहती और उसकी गर्भावस्था कानून द्वारा निर्धारि…और पढ़ें

Publish Date: Fri, 03 Jul 2026 09:47:43 AM (IST)Updated Date: Fri, 03 Jul 2026 09:47:43 AM (IST)

पति से अलग रह रही महिला गर्भ जारी नहीं रखना चाहती, तो सहमति जरूरी नहीं, हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने सुनाया महत्वपूर्ण फैसला
इंदौर हाई कोर्ट। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. याचिकाकर्ता महिला वर्तमान में 13 सप्ताह की गर्भवती है
  2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत महिला को अपनी प्रजनन संबंधी स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वायत्तता का पूर्ण अधिकार प्राप्त है
  3. कोर्ट ने कहा कि महिला के इस अधिकार को ध्यान में रखते हुए उसे गर्भपात की अनुमति दिया जाना पूरी तरह से उचित और न्यायसंगत है

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने एक विवाहित महिला के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उसे ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी’ एक्ट, 1971 के तहत गर्भपात कराने की अनुमति दे दी है।

अदालत ने अपने आदेश में यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई महिला अपनी गर्भावस्था को जारी नहीं रखना चाहती और उसकी गर्भावस्था कानून द्वारा निर्धारित समय सीमा के भीतर है, तो इसके लिए उसके पति की सहमति होना अनिवार्य नहीं है। याचिकाकर्ता महिला वर्तमान में 13 सप्ताह की गर्भवती है।

संविधान का अनुच्छेद 21 देता है प्रजनन की स्वतंत्रता

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संदीप एन. भट्ट की एकलपीठ ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता महिला अपने पति से अलग रह रही है और भविष्य में उसके साथ किसी भी प्रकार का वैवाहिक संबंध नहीं रखना चाहती है। ऐसी स्थिति में, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत महिला को अपनी प्रजनन संबंधी स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वायत्तता का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। कोर्ट ने कहा कि महिला के इस अधिकार को ध्यान में रखते हुए उसे गर्भपात की अनुमति दिया जाना पूरी तरह से उचित और न्यायसंगत है।

मिली जानकारी के अनुसार, पूर्व में दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से तलाक की बात तय हुई थी, परंतु बाद में पति अपनी बात से मुकर गया। इस मामले में कोर्ट द्वारा पति को नोटिस भी जारी किया गया था, लेकिन वह सुनवाई के दौरान अदालत में उपस्थित नहीं हुआ।

कोर्ट द्वारा गर्भपात की अनुमति देने के 3 मुख्य आधार

अदालत ने इस मामले में मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन बिंदुओं को ध्यान में रखकर अपना फैसला सुनाया:

  1. एमटीपी एक्ट की समय सीमा: महिला की गर्भावस्था 13 सप्ताह की है। ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी’ (MTP) एक्ट की धारा 3 के तहत इस अवधि के भीतर एक अधिकृत चिकित्सक द्वारा गर्भसमापन किया जा सकता है।

  2. वैवाहिक अलगाव: पति-पत्नी के बीच चल रहा वैवाहिक अलगाव भी गर्भपात की अनुमति के लिए एक वैध और कानूनी आधार माना जा सकता है।

  3. मौलिक अधिकारों की सर्वोपरिता: किसी भी महिला की स्वयं की इच्छा और उसके संवैधानिक व मौलिक अधिकार सर्वोपरि हैं, जिन्हें किसी अन्य की सहमति के अधीन नहीं रखा जा सकता।

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