नईदुनिया प्रतिनिधि, टीकमगढ़। बुंदेलखंड में जहां हर साल करोड़ों के भारी-भरकम बजट और आधुनिक इंजीनियरिंग से बने नए बांध मानसून की पहली ही बारिश में हांफने लगते हैं। वहीं टीकमगढ़ और निवाड़ी जिलों में बिखरा 1000 साल पुराना चंदेलकालीन वॉटर नेटवर्क आज भी देश के लिए जल संरक्षण की सबसे बड़ी मिसाल बना हुआ है।
नौवीं से बारहवीं सदी के बीच चंदेल राजाओं द्वारा विकसित किया गया यह पारंपरिक इंटर-लिंकिंग सिस्टम (तालाबों का आपस में जुड़ाव) आज भी पूरी तरह एक्टिव है और आधुनिक इंजीनियरों को हैरत में डाल रहा है।
इस प्राचीन और बेजोड़ चैनल सिस्टम को पुनर्जीवित करने में वर्तमान प्रशासनिक इच्छाशक्ति और कड़ी मेहनत का एक बड़ा और प्रेरक उदाहरण सामने आया है। कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय ने इन चंदेल-बुंदेलकालीन तालाबों के चैनल सिस्टम को लेकर काफी व्यक्तिगत रुचि दिखाई है। उनकी इस खास रुचि और प्रशासनिक मुस्तैदी के चलते पिछले साल बारिश के सीजन से पहले इन तालाबों के चैनल सिस्टम पर सालों से जमे अतिक्रमण को सख्ती से हटवाया गया।
कलेक्टर की इस मेहनत के सकारात्मक और जमीनी परिणाम देखने को मिले। अतिक्रमण मुक्त होने के बाद पानी का नेचुरल फ्लो शुरू हुआ और पठा तालाब भरा, तो माडूमर तालाब भरा, इससे महेंद्र सागर तालाब तक पानी सुचारू रूप से पहुंचा। इसके बाद महेंद्र सागर तालाब से वृंदावन तालाब से बंडा नहर के माध्यम से पानी पहुंचा। वृंदावन तालाब भरने के बाद फिर हनुमान सागर तालाब भरा। कलेक्टर विवेक श्रोत्रिय की यह पहल साबित करती है कि अगर प्रशासनिक स्तर पर सही रुचि और कड़ी मेहनत की जाए, तो यह प्राचीन सिस्टम आज भी बुंदेलखंड का भाग्य बदल सकता है।

पठा से माडूमर तालाब को भरने वाली नहर की सफाई कराई गई। सौ. जिला प्रशासन
बिना तकनीक के रचा अद्भुत जल विज्ञान
जानकार बतातें हैं कि अब जब जल प्रबंधन के लिए ड्रोन, जीपीएस, सैटेलाइट सर्वे और उन्नत साफ्टवेयर की आवश्यकता पड़ती है, तब यह विचार आश्चर्यचकित करता है कि सदियों पहले बिना किसी आधुनिक तकनीक के जल स्रोतों को इस प्रकार आपस में जोड़ा गया। महेंद्र सागर, वृंदावन तालाब, मदन सागर, हनुमान सागर, माडूमर तालाब, चंदेरा तालाब, बराना तालाब और जतारा जैसे ऐतिहासिक तालाबों का विज्ञान पूरी तरह वैज्ञानिक ढलान और गुरुत्वाकर्षण पर आधारित है।
इसमें जब ऊंचाई पर स्थित मुख्य तालाब पूरी तरह भर जाता है, तो उसका अतिरिक्त पानी बिना एक बूंद बर्बाद हुए वेस्टवियर के जरिए सिलसिलेवार तरीके से नीचे के अन्य तालाबों को लबालब कर देता है। तालाब शिल्पियों ने इसमें कैचमेंट एरिया और कमांड एरिया का ऐसा सटीक अनुपात निर्धारित किया था कि अगर सामान्य से आधी बारिश भी हो, तो ये तालाब पूरे क्षेत्र की प्यास बुझा सकते हैं।
पूर्वजों की अद्वितीय सोच: सरपट, बेर और बावड़ी
इस वाटर नेटवर्क को केवल तालाबों तक सीमित नहीं रखा गया था, बल्कि पानी को जन-जन तक पहुंचाने के लिए तीन अनूठी संरचनाएं तैयार की गई थीं। पहली संरचना सरपट थी, जो तालाबों से खेतों तक पानी पहुंचाने की अनूठी जलवाहिनी थी। इसमें आदमकद पत्थरों के स्तंभों के ऊपर नहर बनाई जाती थी, जिससे गुरुत्वाकर्षण के आधार पर पानी दूरस्थ खेतों तक बिना किसी पंप के पहुंचता था। दूसरी संरचना बेर थी, जो छोटी बावड़ियों के रूप में विकसित थीं। ये पेयजल का मुख्य स्रोत थीं और भूजल स्तर को बनाए रखती थीं। तीसरी संरचना बावड़ी थी, जो घुमावदार सीढ़ियों वाली विशाल संरचनाएं थीं। ये केवल जल संग्रहण स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र हुआ करती थीं।
सरकारी रिकार्ड में 995 तालाब, पहले थे 1100
ओरछा स्टेट के साल 1907 के गजट के अनुसार कभी इस क्षेत्र में 1100 से अधिक चंदेलकालीन तालाब हुआ करते थे। प्रशासनिक विभाजन के बाद सरकारी रिकार्ड में आज भी 995 तालाब दर्ज हैं, जिनमें से 650 तालाब टीकमगढ़ के हिस्से में और 345 तालाब निवाड़ी जिले के हिस्से में हैं। इन तालाबों का प्रशासनिक नियंत्रण देखें तो 211 तालाब पंचायतों के पास, 88 सिंचाई विभाग, 55 आम निस्तारी, 36 राजस्व विभाग, 26 निजी काश्तकारों और 9 तालाब वन विभाग के पास दर्ज हैं।
फाइलों से बाहर आए धरोहर, जनता भी समझे जिम्मेदारी
विशेषज्ञों का मानना है कि बुंदेलखंड के जल संकट का स्थायी समाधान किसी नए बांध में नहीं, बल्कि इसी प्राचीन धरोहर को सहेजने में है। इसके लिए तालाबों को जोड़ने वाली प्राचीन कड़ियों, नहरों और सरपट से तत्काल अवैध कब्जे हटाए जाएं ताकि पानी का नेचुरल फ्लो बना रहे। इसके साथ ही केवल कागजों पर खानापूर्ति न करते हुए मशीनों के जरिए तालाबों की गाद साफ कर उनकी जल भंडारण क्षमता को दोबारा जीवित करना होगा। विशेषज्ञों का मत है कि यह काम सिर्फ प्रशासन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, इसमें समाज और स्थानीय लोगों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जब तक लोग आत्म-चिंतन कर इन जीवनदायी कड़ियों को खुद खाली नहीं करेंगे और तालाबों को कचरा मुक्त रखने में सहयोग नहीं देंगे, तब तक कोई भी सरकारी योजना सफल नहीं हो सकती, क्योंकि ये तालाब सिर्फ सरकारी संपत्ति नहीं बल्कि पूरे बुंदेलखंड की लाइफ-लाइन हैं।
चंदेलकालीन तालाब और उनका इंटर-लिंकिंग चैनल सिस्टम बुंदेलखंड की अनमोल धरोहर हैं। हमारी प्राथमिकता इन प्राचीन कड़ियों को अतिक्रमण से मुक्त कराकर पानी के प्राकृतिक प्रवाह को बहाल करना है। पिछले वर्ष पठा से महेंद्र सागर और फिर वृंदावन तालाब तक पानी पहुंचाने का प्रयोग बेहद सफल रहा। यह प्राचीन इंजीनियरिंग आज भी उतनी ही कारगर है, बस जरूरत इसे सहेजने और पुनर्जीवित करने की है। प्रशासन इसके लिए पूरी तरह गंभीर है, लेकिन इसमें आम जनता और समाज की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। – विवेक श्रोत्रिय, कलेक्टर, टीकमगढ़
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