बचपन के संघर्ष की बात छिड़ते ही निशानेबाज साक्षी पाडेकर तपाक से बोलती हैं, मुझे कोई सहानुभूति नहीं चाहिए। बावजूद इसके मैं अपनी कहानी देश के हर युवा को इसलिए बताना चाहती हूं कि अगर मैं कर सकती हूं तो हर कोई कर सकता है।
सीनियर स्तर पर दूसरा विश्वकप खेलने चीन गईं साक्षी गर्व से बताती हैं कि मैं चौकीदार पिता की बेटी हूं। मैं भारतीय टीम में हूं, पर मेरे पापा आज भी चौकीदारी करते हैं। मां गृहणी हैं, लेकिन वह भी कुछ समय पहले तक सात हजार रुपये प्रतिमाह पर वेल्डिंग का काम करती थीं। इस दौरान उनकी अंगुलियां जख्मी हो गई, जिसके चलते उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी।
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