‘बाल विवाह कराने वाले माता-पिता जिम्मेदारी से नहीं बच सकते’, इंदौर हाई कोर्ट का फैसला

‘बाल विवाह कराने वाले माता-पिता जिम्मेदारी से नहीं बच सकते’, इंदौर हाई कोर्ट का फैसला

बाल विवाह से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने न सिर्फ पीड़िता को राहत दी बल्कि बाल विवाह कराने वाले माता-पिता पर भी टिप्पणी की है। कोर्ट ने …और पढ़ें

Publish Date: Tue, 02 Jun 2026 08:18:22 PM (IST)Updated Date: Tue, 02 Jun 2026 08:18:22 PM (IST)

‘बाल विवाह कराने वाले माता-पिता जिम्मेदारी से नहीं बच सकते’, इंदौर हाई कोर्ट का फैसला
बाल विवाह कराने वाले को लेकर HC सख्त। (AI से जेनरेट किया गया इमेज)

HighLights

  1. बाल विवाह कराने वाले को लेकर HC सख्त
  2. माता-पिता जिम्मेदारी से नहीं बच सकते
  3. इंदौर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। बाल विवाह से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने न सिर्फ पीड़िता को राहत दी बल्कि बाल विवाह कराने वाले माता-पिता पर भी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि बाल विवाह कराने वाले माता-पिता अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। पति आर्थिक संकट में है तो उसे उन अभिभावकों की सहायता लेनी चाहिए जिन्होंने उसका बाल विवाह करवाया।

कोर्ट ने आदेश में यह भी कहा कि कम उम्र में शादी कराकर लड़की को पहले बाल विवाह का शिकार बनाया गया और फिर बाद में उसे मामूली भरण-पोषण देकर दोबारा पीड़ित किया जा रहा है। कोर्ट ने पत्नी को दिए जा रहे दो हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण को अपर्याप्त मानते हुए इसे बढ़ाकर छह हजार रुपये प्रतिमाह कर दिया।

नीमच कुटुंब न्यायालय के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका

नीमच कुटुंब न्यायालय के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका प्रस्तुत हुई थी। दरअसल नीमच कुटुंब न्यायालय ने पीड़ित पत्नी को दो हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। पत्नी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका प्रस्तुत कर राशि बढ़ाने की मांग की थी।

याचिका में उसने बताया दोनों का विवाह 27 अप्रैल 2015 को हुआ था। पत्नी ने यह आरोप भी लगाए कि विवाह के बाद उसके साथ क्रूरता की गई, पति पर्याप्त साधन होने के बावजूद खर्च नहीं दे रहा है। उसने 10 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण के रूप में और आवास खर्च अलग से दिलवाए जाने की मांग की थी।

पति ने किया नाबालिग होने का दावा

याचिका के जवाब में पति की ओर से दिए जवाब में दावा किया कि विवाह के समय पत्नी की आयु केवल 13 वर्ष थी, जबकि वह स्वयं 18 वर्ष का था। पति ने यह भी कहा कि विवाह के बाद वह उदयपुर चला गया था और दोनों के बीच कोई वैवाहिक संबंध स्थापित ही नहीं हुए। पति ने पत्नी के आरोपों को झूठा बताया।

हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि यदि पति की यह बात कि विवाह के समय पत्नी नाबालिग थी सही मान भी ली जाए तो यह स्पष्ट है कि पत्नी बाल विवाह की शिकार रही है। कोर्ट ने कहा कि रीति-रिवाज की आड़ में उसे दोबारा प्रताड़ित नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि वर्तमान परिस्थिति में पत्नी को दी जा रही दो हजार रुपये प्रतिमाह की राशि को पर्याप्त नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने भरण पोषण की राशि बढ़ाकर छह हजार रुपये प्रतिमाह करने का आदेश दिया। यह राशि पति को अगस्त 2021 से देना होगी।

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